भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५२३ ) परंब्रह्मोपासने देवानामुपासकत्वकथनं देवानामितरोपासन निवृत्तिं द्योतयति । अत एषु वस्वादीनामनधिकारः । “देवगण ज्योतियों की ज्योति उस परब्रह्म को, आयु और अमृत मान कर उपासन करते हैं" ऐसी ज्योति रूप परब्रह्म की उपासना का वर्णन किया गया है। परब्रह्म की उपासना में देवताओं और मनुष्यों का तुल्याधिकार होते हुए भी, यहाँ जो पृथक् उपासकता बतलाई गई है, इससे, देवताओं के लिए अन्यों की उपासना की निवृत्ति का भाव द्योतित होता है। इससे स्पष्ट होता है कि-मधु आदि विद्याओं मे देवताओं का अधिकार नहीं है [अर्थात् देवताओं के उपास्य एकमात्र ब्रह्म ही है, ऐसा उक्त उदाहरण से प्रतीत होता है, मधु आदि विद्याओं में देवताओं को स्वयं उपास्य बतलाया गया है, इसलिए वे स्वयं उसमें उपासक नहीं हो सकते, इन विद्याओं में मनुष्यों के ही अधिकार की बात निश्चित होती है। इति प्राप्तेऽभिधीयते सिद्धान्त :-- उक्त मत पर सूत्रकार सिद्धान्त रूप से सूत्र प्रस्तुत करते हैं— भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ।१।३।३२।। आदित्य वस्वादीनामपि तेष्वधिकारभावं भगवान् बादरायणो मन्यते । अस्ति ह्यादित्य वस्वादीनामपि स्वावस्थब्रह्मोपासनेन वस्वादित्व प्राप्ति पूर्वकं ब्रह्मप्रेप्सा संभवः । इदानीं वस्वादीनामपि सतां कल्पांतरेऽपि वस्वादित्व प्राप्तिश्चोपेक्षिता भवति । मधु आदि ब्रह्मविद्या में आदित्य वसु आदि का अधिकार भगवान बादरायण मानते हैं। आदित्य और वसु आदि भी, आत्मा में अवस्थित पर ब्रह्म की उपासना द्वारा, वस्वादि भाव पूर्वक ब्रह्म प्राप्ति के इच्छुक हो सकते हैं। इस जन्म में जो वसु आदि हैं, वे कल्पान्तर में भी वसु आदि ही हों, ऐसी अपेक्षा भी तो, उपासना द्वारा हो सकती है। अत्रहि कार्यकारणोभयावस्थ ब्रह्मोपासनं विधीयते । “असौ वा आदित्यो देवमधु” इत्यारभ्य- “तत ऊर्ध्वं उदेत्य” इत्यतः ankurnagpal108@gmail.com