श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२४ ) प्रागादित्यवस्वादिकार्यविशेषावस्थं ब्रह्मोपास्यसुपदिश्यते । “अथतत ऊर्ध्वं उदेत्य” इत्यादिना आदित्यान्तरात्मतयाऽवस्थितं कारणावस्थ मेव ब्रह्मोपास्यमुपदिश्यते । तदेवं कार्यकारणोभयावस्थं ब्रह्मोपासीनः कल्पान्तरे वस्वादित्वं प्राप्य तदन्ते कारणं परंब्रह्मैवाप्नोति । उक्त प्रकरण मे कार्य और कारण दोनों अवस्था वाले ब्रह्म की उपासना का विधान किया गया है । “असौ वा आदित्यो” इत्यादि से प्रारंभ करके “अथ तत ऊर्ध्वं” इत्यादि वाक्य के पूर्व तक, आदित्य वसु आदि को कार्य विशेषावस्थापन्न ब्रह्मोपासना का उपदेश दिया गया है । “अथ तत ऊर्ध्वं” इत्यादि वाक्य मे, आदित्य के अंतरात्मा मे अवस्थित, कारणावस्थ ब्रह्म की उपासना का उपदेश है । कार्य और कारण इन दोनों अवस्थाओ वाले ब्रह्म के उपासक, कल्पांतर में वसु आदि रूप प्राप्त कर, अन्त में कारण ब्रह्म में लीन हो जाते हैं, यही उक्त उपदेश का तात्पर्य है । “न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद् दिवा हैवास्मै भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद” इति कृत्स्नाया मधुविद्याया ब्रह्मोपनिषत्व श्रवणात् ब्रह्मप्राप्तिपर्यन्तवस्वादित्वफलस्य श्रवणाच्च वस्वादि भोग्यभूत् आदित्यांशस्य विधीयमानमुपासनं तदवस्थस्यैव ब्रह्मण इत्यवगम्यते । अतएवं विधमुपासनमादित्य वस्वादीनामपि संभवति । एवं च ब्रह्मण एवोपास्यत्वात् “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिः” इत्युपपद्यते । तदाह वृत्तिकारः-“अस्ति हि मध्वादिषु संभवो ब्रह्मण एव सर्वत्र निचाय्यत्वात् । ‘जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद को जानते हैं, उनके लिए न तो सूर्य का उदय होता है न अस्त, उनके लिए तो मदा दिन ही दिन रहता है' इत्यादि में, समस्त मधुविद्या की ब्रह्मोपनिषद स्वरूपता, ब्रह्म प्राप्ति पर्यन्त वसु आदि रूप फल प्राप्ति, वसु आदि भोग्यभूत आदित्यांश को उपासना, उस अवस्था में ही ब्रह्मावाप्ति आदि, बातें ज्ञात होती है इससे