भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५२५ ) सिद्ध होता है कि-आदित्य वसु आदि से भी मधुविद्या की उपासना संभव है । इसीलिए ब्रह्म की भी उपास्यता “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिः" इत्यादि में बतलाई गई है । जैसा कि-वृत्तिकार भी कहते है-'सर्वत्र ब्रह्म की उपासना ही विहित है, इसलिए मधुविद्या आदि में देवतादि का अधिकार हो सकता है ।' ६ अपशूद्राधिकरण :- शुगस्यतदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि ।१।३।३३॥ ब्रह्मविद्यायां शूद्रस्याप्यधिकारोऽस्ति नवेति विचार्यते; किं युक्तम् ? अस्तीति, कुतः ? अर्थित्वसामर्थ्य प्रयुक्तत्वादधिकारस्य शूद्रस्यापि तत्संभवात् । यद्यप्यग्निविद्या साध्येषु कर्मष्वनग्नि विद्यत्वाच्छूद्रस्यानधिकारः, तथापि मनोवृत्तिमात्रत्वाद ब्रह्मोपासनस्य तत्राधिकारोऽस्त्येव, शास्त्रीय क्रियाऽपेक्षत्वेऽप्युपासनस्य तत्तद्वर्णा- श्रमोचित क्रियाया एवापेक्षितत्वाच्छूद्रस्यापि स्ववर्णोचितपूर्ववर्णां शुश्रूषैव क्रिया भविष्यति । "तस्माच्छूद्रोयज्ञेऽनवक्लृप्तः” इत्यप्यग्नि- विद्यासाध्ययज्ञादिकर्मानधिकार एव न्यायसिद्धोऽनूद्यते । ब्रह्मविद्या में शूद्रों का अधिकार है कि नहीं ? इस पर विचार करते हैं । कह सकते हैं कि है, क्यो कि-शूद्रो मे भी अन्यवर्णों की तरह अर्थित्व और सामर्थ्य संभव है । यद्यपि अग्निविद्या साध्य कर्मों में अग्निहोत्री न होने के कारण, शूद्रों का अनधिकार सिद्ध होता है, तथापि ब्रह्मविद्या जब एक मनोवृत्ति मात्र ही है, तब उसमे उनका स्वाभाविक अधिकार सिद्ध हो जाता है । उपासना, यदि शास्त्र क्रिया सापेक्ष्य हो तो भी, शास्त्रानुसार अपनी वर्णोचित क्रिया सुश्रूषा के आश्रय से, वे शूद्र भी, अन्य वर्णों की तरह, उपासना के अधिकारी हो सकते हैं । “शूद्र यज्ञ में अनधिकृत हैं" यह श्रुति तो, एकमात्र अग्निविद्या साध्य यज्ञादि कर्मों में ही, शूद्र के अनधिकार की पुष्टि करती है । नन्वधीत वेदस्य श्रुतवेदांतस्य ब्रह्मस्वरूप तदुपासन प्रकारा- नभिज्ञस्य कथं ब्रह्मोपासनं संभवति ? उच्यते-अनधीतवेदस्या श्रुतवे- ankurnagpal108@gmail.com