श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५३६ ) दांतवाक्यस्यापीतिहासपुराण श्रवणेनापि ब्रह्मस्वरूपतदुपासनज्ञानं संभवति । अस्ति च शूद्रस्यापीतिहासपुराण श्रवणानुज्ञा श्रावयेच्च- तुरोवर्णान् कृत्वाब्राह्मणमग्रतः” इत्यादौ । दृश्यंतेचेतिहासपुराणेषु विदुरादयो ब्रह्मनिष्ठाः । तथोपनिषत्स्वपि संवर्गविद्यायां शूद्रस्यापि ब्रह्मविद्याधिकारः प्रतीयते-शुश्रूषु हि जानश्रुतिमाचार्यो रैकवः शूद्रेत्यामंत्र्य तस्मैब्रह्मविद्यामुपदिशति-“आजहारेमाः शूद्रोनेनैव मुखेनालापयिष्यथाः” इत्यादिना । अतः शूद्रस्याप्यधिकारः संभवति । यदि कहो कि-जिन्होंने वेदाध्ययन, वेदांत श्रवण नहीं किया तथा जो ब्रह्म के स्वरूप और उपासना से अनभिज्ञ हैं, वे ब्रह्मोपासना कर कैसे पावेंगे ? तो सुनिये-वेदाध्ययन और वेदांतश्रवण के बिना भी पुराणेति- हास के श्रवण से ही ब्रह्मस्वरूप और उपासना पद्धति का ज्ञान संभव है । इतिहास पुराण के श्रवण की आज्ञा शूद्र को-“ब्राह्मण को अग्रवर्ती करके चारों वर्णों को रहस्य श्रवण करना चाहिए” इत्यादि से शास्त्र से ही प्राप्त है। इतिहास पुराण आदि में विदुरादि के ब्रह्मनिष्ठ होने की चर्चा है। उपनिषदों में भी संवर्ग विद्या के प्रकरण में, शूद्रों को ब्रह्मविद्या के अधिकार की चर्चा है। आचार्य रैकव ने ब्रह्म शुश्रूषु जानश्रुति को “शूद्र” कह कर पुनः उसे ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया है, जैसे कि-हे शूद्र ! तू ये गौ कन्या आदि लाया है, तू इस विद्याग्रहण के बहाने ही मुझसे बातें कर रहा है” इत्यादि से ज्ञात होता है। इसलिए शूद्र का अधिकार सिद्ध होता है। सिद्धान्त-इति प्राप्ते उच्यते-न शूद्रस्याधिकारः संभवति, सामर्थ्याभावात् , न हि ब्रह्मस्वरूपतदुपासनप्रकारमजानतस्तदंग- भूतवेदानुवचनयज्ञादिष्वनधिकृतस्योपासनोपसंहारसामर्थ्यसंभवः, असमर्थस्य च अर्थितत्व सद्भावेऽप्यधिकारो न संभवति, असामर्थ्य च वेदाध्ययनाभावात्, यथैव हि त्रैवर्णिकविषयाध्ययनविधिसिद्ध- ankurnagpal108@gmail.com