श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२७ ) स्वाध्याय संपाद्यज्ञान लाभेन कर्मविधयो ज्ञानतदुपयादीनपरान्न स्वीकुर्वन्ति, तथा ब्रह्मोपासन विधयोऽपि । अतोऽध्ययन विधिसिद्ध स्वध्याधिगतज्ञानस्यैव ब्रह्मोपासनोपायत्वाच्छूद्रस्य ब्रह्मोपासन सामर्थ्यासंभवः । उक्त मत पर सिद्धान्त स्थिर करते हैं कि-शूद्र का अधिकार नहीं है, क्यों कि-उनमें सामर्थ्य का अभाव है । जो ब्रह्म के स्वरूप और उनकी उपासना प्रणाली को नही जानते तथा उपासना के अंगस्वरूप वेदपाठ यज्ञादि में जिनका अनधिकार है, उनमें उपासना के अनुकूल सामर्थ्य संभव नहीं है, वेदाध्ययन का अभाव ही, सामर्थ्य का अभाव है । ब्राह्मण आदि तीन वर्णों के लिए वेदाध्ययन शास्त्र विहित है, वेदाध्ययन संपाद्य ज्ञान से ही उन लोगों को उपासना का अधिकार प्राप्त है । कर्म विधि जैसे कि—ज्ञान और तदुपयोगी अन्यान्य साधनों की अपेक्षा नही करती है, ब्रह्मोपासना की विधि भी उसी प्रकार है । अध्ययन विधि लभ्य वेदाध्ययन जन्य ज्ञान ही ब्रह्मोपासना का प्रधान उपाय है । वैदिक ज्ञान के अभाव से ही, शूद्रों में ब्रह्मोपासना का सामर्थ्य संभव नही है । इतिहास पुराणे अपि वेदोपबृंहणं कुर्वती एवोपायभावमनुभवतः न स्वातंत्र्येण शूद्रस्येतिहास पुराण श्रवणानुज्ञानं पापक्षयादिफलार्थम्, नोपासनार्थम् । विदुरादयस्तु भवान्तराधिगतज्ञाना प्रमीषात् ज्ञानवंतः प्रारब्धकर्मवशाच्चेदृशजन्मयोगिन इति तेषां ब्रह्मनिष्ठ- त्वम् । इतिहास पुराण में भी, वेदोपबृंहण करके ही, उपासना के उपायों का विवेचन किया गया है, स्वच्छन्द विवेचन नहीं है । शूद्रों को जो इतिहास पुराण श्रवण का उपदेश दिया गया है वह, पापक्षय फल प्राप्ति के निमित्त से दिया गया है, उपासना के लिए नही दिया गया है। जन्मा- न्तराधिगत अविलुप्त ज्ञानसंपन्न विदुर आदि, प्रारब्ध कर्मवश शूद्र योनि मे गए थे, वस्तुतः वे जन्मसिद्ध ब्रह्मनिष्ठ थे ।