श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७ २. सिद्धान्त- उत्क्रमण काल में इन्द्रियों का मन से मिलने का प्रतिपादन तथा इन्द्रियों की अणुता का उपपादन। —पृ०११३६-४१ २. मनोधिकरण (सूत्र ३) मरण काल में इन्द्रियों सहित मन का प्राण से मिलने का वर्णन। —पृ०११४१-४२ ३. अध्यक्षाधिकरण (सूत्र ४) देहाध्यक्ष जीव की प्राण संबद्धता का निरूपण। —पृ०११४२-४३ ४. भूताधिकरण (सूत्र ५-६) जीव समन्वित प्राण की भूतसंबद्धता का निरूपण। भूतों से प्राण संयोग का समर्थन। —पृ०११४३-४५ ५. आसृत्युपक्रमाधिकरण (सूत्र ७-१३) १. पूर्वपक्ष—विद्वान और अविद्वान के भेद से उपक्रमण के पार्थक्य की संभावना का संशय। २ सिद्धान्त—उपक्रमण में विद्वान अविद्वान की समानता का प्रतिपादन। ब्रह्म प्राप्ति न होने तक संसारगति का समर्थन। देह त्याग के उपरान्त भी जीव का सूक्ष्म शरीर से संबन्ध निरूपण। सूक्ष्म शरीर के सद्भाव से ही दैहिक उष्णता की उपलब्धि ज्ञापन। पृ०११४५-५३ ६. पर संपत्त्यधिकरण (सूत्र १४) जीव समन्वित भूतों की परमात्म लीनता का वर्णन। —पृ०११५३-५४ ७. अविभागाधिकरण (सूत्र १५) जीव समन्वित भूतों की परमात्मा से अविभक्त स्थिति का निरूपण —पृ०११५४-५५ ८. तदोकोधिकरण (सूत्र १६) मृत्युकाल में उपासक के हृदयाग्रभाग में ज्वलन का वर्णन। —पृ०११५५-५७ ankurnagpal108@gmail.com