श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२६ ) वत्तरः महताधर्मेण संयुक्तस्याप्यस्य जानश्रुतेरब्रह्मज्ञस्य को गुणः, यद्गुणजनितं तेजो रैक्वतेज इव मां दहेदित्यर्थः । जो शोक करे उसे शूद्र कहते हैं, “शुचेर्दश्च” इस पाणिनीय सूत्र से, र प्रत्यय होने पर शुच् धातु के उकार को दीर्घ और च के स्थान पर द होने से शूद्र शब्द बनता है । उक्त प्रसंग में शूद्र शब्द से शोकान्वित भाव ही सूचित होता है, जाति संबंध नहीं । पौत्रायण जानश्रुति, बहुद्रव्य और बहुअन्न का प्रसिद्ध दानी था, धार्मिकाग्रगण्य उसकी धर्मचर्या से परितुष्ट कोई दो महात्मा, उसकी ब्रह्मजिज्ञासा, को उद्बुद्ध करने के लिए, हंस रूप धारण करके, रात्रि के समय, यात्रा में उसके साथ चलते हुए इस प्रकार परस्पर वार्त्ता करने लगे--‘‘अरे भल्लाक्ष ! पौत्रायण जानश्रुति का तेज आकाश में चारों ओर फैल रहा है, उसका स्पर्श मत करना, कहीं वह तुम्हें भस्म न कर दे’’ ऐसी जानश्रुति की प्रशंसा सुनकर दूसरा कहता है-‘’अरे तू इस राजा में कौन सी विशेषता देखकर ऐसी प्रशंसा कर रहा है, क्या तू इसे गाड़ी वाले रैक्व के बराबर मानता है ?’’ अर्थात् ब्रह्मज्ञ वह रैक्व जगत में सर्वाधिक गुणवान है, यह जानश्रुति महा धार्मिक होते हुए भी ब्रह्म ज्ञान रहित है, उसमें कौन सा गुण है जिससे कि उसमें रैक्व के समान दाहिका शक्ति आ गई जिससे मुझे दाह होगा ? एवमुक्तेन परेण क्वोऽसौ रैक्व इति पृष्टः लोके यल्किञ्चित् साध्वनुष्ठितं कर्म यच्च सर्वचेतनगतं विज्ञानम्, तदुभयं यदीयज्ञान- कर्मान्तर्भूतम् स रैक्व” इत्याह। तदेतद् हंसवाक्यं ब्रह्मज्ञानविधुरतया आत्मनिन्दागर्भं तद्वत्तया च रैक्व प्रशंसा रूपं जानश्रुतिरुपश्रुत्य तत्क्षणादेवक्षत्तारं रैक्वान्वेषणाय प्रेष्य तस्मिन्विदित्वा आगते स्वय- मपि रैक्वभुपसद्य गवां षट्शतं निष्कमश्वतरी रथं च रैक्वायोपहृत्य रैक्व प्रार्थयामास “अनुम एतां भगवो देवतां शाधि यां देवता- मुपास्से” इति त्वदुपास्यां परां देवतां ममानुशाधीत्यर्थः । इस प्रकार उस हंस के कहने पर, दूसरे ने पूछा ‘‘यह रैक्व कौन है ?’’ इस पर उस हंस ने बतलाया कि--‘‘इस जगत में जो भी कुछ ankurnagpal108@gmail.com