भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 592

( २१० ) उत्कृष्ट कर्म होते हैं तथा समस्त चेतन में जो कुछ ज्ञान निहित है, ये दोनों बातें जिसके ज्ञान और कर्म के अंतर्गत हैं वे रैक्व है।" ब्रह्मज्ञान के अभाव से अपने निंदापूर्ण तथा ब्रह्मज्ञान के सद्भाव से रैक्व के स्तुति- परक उस हंस के वाक्य को सुनकर जानश्रुति ने तत्काल सारथी को रैक्व को खोजने को भेजा। सारथी, रैक्व को खोज कर आया तब, जानश्रुति स्वयं रैक्व के पास गया, जाकर उसने छः सौ गाय, स्वर्णहार, घोड़ेवाले रथ भेंट कर उनसे प्रार्थना की कि--"भगवन ! आप जिन देवता की उपासना करते हैं उनका मुझे उपदेश दें" अर्थात् अपने उपास्य परादेवता का मुझे भी उपदेश दो। स च रैक्वः स्वयोगमहिम विदित लोकत्रयो जानुश्रुतेर्ब्रह्मज्ञान विधुरतानिमित्तानादरगर्भहंसवाक्य श्रवणेन शोकाविष्टतां तदनंतर- मेव ब्रह्मजिज्ञासोद्योगं च विदित्वाऽस्य ब्रह्मविद्यायोग्यतामभिज्ञाय चिरकाल सेवां बिना द्रव्यप्रदानेन शुश्रूषमाणस्यास्य यावच्छक्ति प्रदानेन ब्रह्मविद्या प्रतिष्ठिता भवतीति मत्वा तमनुगृह्णन् तस्य शोकाविष्टतामुपदेशयोग्यताख्यापिकां शूद्र शब्देनामंत्रणेन ज्ञापयन्नि- दमाह-“अहहारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्तु” इति । सह गोभि- रयं रथस्तवैवास्तु नैतावता मह्यं दत्तेन ब्रह्मजिज्ञासया शोकाविष्टस्य तव ब्रह्मविद्या प्रतिष्ठिता भवतीत्यर्थः । अपनी योगशक्ति के प्रभाव से त्रिलोक तत्त्वज्ञ उस रैक्व ने समझ लिया कि--ब्रह्मज्ञानाभाव और हंसोक्त अनादर वचन श्रवण से जानश्रुति शोकाविष्ट है, इसीलिए यह असूयावश ब्रह्मविद्या प्राप्ति के लिए उद्यत है। उसकी ऐसी ब्रह्मजिज्ञासा योग्यता को समझकर कि दीर्घकालीन ब्रह्मचर्य की साधना के बजाय केवल भेंट द्वारा ही ब्रह्मविद्या ग्राहिका शक्ति आ जावेगी, ऐसा विचार कर अनुग्रह पूर्वक रैक्व ने जानश्रुति से कहा--"अरे शूद्र ! गौओं सहित यह हारयुक्त रथ तेरे ही पास रहे" अर्थात्-गो रथ आदि तू ही रख, इनको देने मात्र से ही, शोकाविष्ट ब्रह्म जिज्ञासु तुझमें ब्रह्म विद्या स्थिर नहीं हो सकती। ankurnagpal108@gmail.com

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक) · पृष्ठ 592, कुल 696 में से · BharatKosha