श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५३१ ) स च जानश्रुतिर्भूयोऽपि स्वशक्त्यनुगुणमेव गवादिकंधनं कन्यां च प्रदायोपससाद, स रैकवः पुनरपि तस्य योग्यतामेव ख्यापयन् शूद्र शब्देनामंत्र्याह—"आजहारेमा शूद्रानेनैव मुखेनाला पयिष्यथाः" इति इमानि धनानि शक्त्यनुगुणान्याजहर्थ, अनेनैव द्वारेण चिरसे- वया बिनाऽपि मां त्वदभिलाषितं ब्रह्मोपदेश रूपवाक्यमालापयिष्य- तीत्युक्त्वा तस्मा उपदिदेश अतः शूद्रशब्देन विद्योपदेशयोग्यताख्या- पनार्थं शोक एवास्य सूचितः न चतुर्थवर्णत्वम्। उस जानश्रुति ने और अधिक गौ कन्या आदि लाकर देते हुए ब्रह्मजिज्ञासा की-रैक्व ने उसकी योग्यता को जानने के लिए उसे पुनः शूद्र कहते हुए कहा—"अरे शूद्र । अपनी शक्ति के अनुसार जो गौवें और कन्यायें लाया है इनके द्वारा ही तू मुझसे, बिना चिरन्तन कालीन सेवा के, ब्रह्मोपदेश चाहता है" इतना कह उसे उपदेश दिया । इस प्रसंग के विवेचन से ज्ञात होता है कि—जानश्रुति की विद्योपदेश योग्यता की परीक्षा और असूयायुक्त शोक को सूचित करने के लिए ही उसे शूद्र कहा गया । अंतिमवर्ण का सूचक शूद्र शब्द नही है । क्षत्रियत्ववगतेश्च ।१।३।३४॥ "बहुदायी" इति दानपतित्वेन "बहुपाक्यः" इत्यादिना" सर्वत एवं एतदन्नमत्स्यति "इत्यन्तेन बहुतरपक्वान्नप्रदायित्व प्रतीते ।" सहसज्जहान एव क्षत्तारमुवाच" इति क्षत्रियत्व प्रती- तेश्च न चतुर्थवर्णत्वम् । "बहुत दान करने वाला" पद से दानशीलता तथा "बहुत अन्न पकाया गया" आदि से लेकर "सब लोग यही अन्न खावें" इस पद तक अनेक पक्वान्नों के दान की चर्चा से और "उसने शय्या त्याग करते ही सारथी से कहा" इत्यादि वर्णनों से क्षत्रियत्त्व की प्रतीति होती है, चतुर्थ- वर्ण शूद्रता की प्रतीति नहीं होती । ankurnagpal108@gmail.com