श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५३२ ) तदेवमुपक्रमगताख्यायिकायां क्षत्रियत्व प्रतीतिरुक्ता, उपसंहार- गताख्यायिकायामपि क्षत्रियत्वमस्य प्रतीयत इत्याह— उपाख्यान के उपक्रम से तो जानश्रुति का क्षत्रियत्व प्रतीत होता ही है, उपाख्यान के उपसंहार से भी क्षत्रियत्व की प्रतीति होती है-यही बतलाते हैं । उत्तरत्र चैत्ररथेन लिंगात् ।१।३।३५॥ अस्य जानश्रुतेरुपदिश्यमानायामस्यामेव संवर्गविद्यायामुत्तरत्र कीर्त्यमानेनाभिप्रतारिणाम्ना चैत्ररथेन क्षत्रियेणास्य क्षत्रियत्वं गम्यते । कथम् ? “अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनि परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे” इत्यादिना “ब्रह्मचा- रिन्नेदमुपास्महे” इत्यंतेन कापेयाभिप्रतारिणोर्भिक्षमाणस्य ब्रह्मचा- रिणश्च संवर्गविद्या संबंधित्वं प्रतीयते । तेषुचाभिप्रतारी क्षत्रियः इतरौ ब्राह्मणौ अतोऽस्यां विद्यायां ब्राह्मणस्य तदितरेषु च क्षत्रि- यस्यैवान्वयो दृश्यते, न शूद्रस्य । अतोऽस्यां विद्यायांमन्विताद् रैक्वाद् ब्राह्मणात् अन्यस्य जानश्रुतेरपि क्षत्रियत्वमेव युक्तम् ; न चतुर्थ- वर्णत्वम् । जानश्रुति के उपदेश प्राप्त हो जाने के बाद, इसी संवर्ग विद्या के अंतिम प्रकरण में चित्ररथवंशज अभिप्रतारि को क्षत्रिय बतलाया गया है, जिससे कि क्षत्रियत्व की प्रतीति होती है । “कापेय शौनक और कक्षसेन के पुत्र अभिप्रतारी को भोजन परोसते समय ब्रह्मचारी ने भिक्षा मांगी” इत्यादि से लेकर “ब्रह्मचारी ! हम उसी की उपासना करते हैं” इस अंतिम वाक्य तक कापेय, अभिप्रतारी और ब्रह्मचारी का, संवर्ग विद्या से संबंध प्रतीत होता है । इन तीनों में अभिप्रतारी क्षत्रिय और दो ब्राह्मण थे, इस विद्या में ब्राह्मण और क्षत्रियों का ही संबंध दिखलाया गया है शूद्र का नहीं । इसलिए इस विद्या से सबद्ध रैक्व ब्राह्मण से भिन्न जानश्रुति को भी क्षत्रिय मानना ही युक्तियुक्त है, शूद्रा मानना ठीक नही है । ankurnagpal108@gmail.com