श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनन्वस्मिन् प्रकरणेऽभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वं क्षत्रियत्वं च न श्रुतम् तत्कथमस्याभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वम् ? कथं वा क्षत्रियत्वं ? तत्राह-लिङ्गात् इति । "अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिम्" इत्यभिप्रतारिणः कापेयसाहचर्याल्लिङ्गादस्याभि प्रतारिणः कापेय संबंधः प्रतीयते । अन्यत्र च "एतेन वैचैत्ररथं कापेया अयाजयन्" इति कापेयसंबंधिनश्चैत्ररथत्वं श्रूयते, तथा चैत्ररथस्य क्षत्रियत्वं-"तस्माच्चैत्रथोनामैकः क्षत्रपतिरजायत" इति । अतोऽभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वं क्षत्रियत्वं च गम्यते । प्रश्न होता है कि-इस प्रकरण में अभिप्रतारी का चैत्ररथत्व और क्षत्रियत्व, स्पष्ट रूप से तो कहा नहीं गया, फिर यह कैसे जाना कि वह चित्ररथवंशज क्षत्रिय था ? कहते हैं कि-चिन्ह से ही ज्ञात होता है । "एक बार कापेय शौनक और काक्षसेनि अभिप्रतारी" इत्यादि वाक्य में कापेय के साथ अभिप्रतारी का वर्णन किया गया है जिससे ज्ञात होता है कि अभिप्रतारी भी किसी गोत्र से संबद्ध था । अन्यत्र "कापेय इसके द्वारा ही चैत्ररथ को यज्ञ कराते हैं" इत्यादि में भी कापेय और चैत्ररथ का संबंध दिखलाया गया है, तथा-"चैत्ररथ नाम का एक क्षत्रपति था" इत्यादि से चैत्ररथ का क्षत्रियत्व स्पष्ट प्रतीत होता है । इन सभी वर्णनों से अभिप्रतारी का चैत्ररथत्व और क्षत्रियत्व ज्ञात होता है । तदेवं न्यायविरोधिनि शूद्रस्याधिकारे लिंगं नोपलभ्यत इत्युक्तम्, इदानीं न्याय सिद्धः शूद्रस्यानधिकारः श्रुतिस्मृतिभिर- नुगृह्यत, इत्याह-- युक्ति विरुद्ध शूद्राधिकार विषयक कोई प्रमाण नहीं है यह दिख- लाया गया । शूद्र का अनधिकार युक्तिसम्मत तथा श्रुति स्मृति अनुमोदित है, यही बतलाते हैं- संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ।१।३।३६॥ ब्रह्मविद्योपदेशेषूपनयनसंस्कारः परामृश्यते-"उप त्वानेष्ये" "तं होपनिन्ये" इत्यादिषु । शूद्रस्य चोपनयनादिसंस्काराभावोऽ-