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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५३४ ) भिलप्यते–“न शूद्रे पातकं किंचिन्न च संस्कारमर्हति”—चतुर्थोवर्णं एकजातिर्न च संस्कारमर्हति” इत्यादिषु । जहाँ ब्रह्मविद्योपदेश प्रकरणों में उपनयन संस्कार के विषय में “तुझे उपनीत करता हूँ” उसे उपनीत किया “ऐसा विचार किया गया हैं वही शूद्र के लिए उपनयन का अनधिकार भी बतलाया गया है—’ शूद्र को किसी प्रकार का पाप नही लगता और न वह किसी संस्कार के योग्य ही है “चौथा वर्ण ही एक ऐसी जाति है जिसे सस्कार की आवश्यकता नही है” इत्यादि । तदभाव निर्धारणे च प्रवृत्तेः ।१।३।३७॥ “नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याहर” इति शुश्रूषो र्जावालस्य शूद्रत्वाभाव निर्धारणे सत्येव विद्योपदेशप्रवृत्तेश्च न शूद्रस्याधिकारः । “ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर नही कर सकता इसलिए सौम्य ! तू समिधा ले आ” ऐसे शुश्रूषु जाबालि के शूद्रत्व के अभाव को भली भाँति जानकर ही गौतम विद्योपदेश में प्रवृत्त हुए । इस वर्णन से ज्ञात होता है कि-शूद्र का ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है । श्रवणाध्ययनार्थ प्रतिषेधात् ।१।३।३८॥ शूद्रस्य वेद श्रवणतदध्ययनतदर्थानुष्ठानानि प्रतिषिध्यंते– “पद्युहवा एतच्छमशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रसमीपे नाध्येतव्यम्”– तस्माच्छूद्रो बहुपशुरयज्ञीय” इति । बहुपशुः पशुसदृश इत्यर्थः । श्रनुपशृण्वतो अध्ययनतदर्थज्ञानतदर्थानुष्ठानानि न संभवंति, अतस्तान्यपि प्रतिषिद्धान्येव । शूद्र को, वेद श्रवण, अध्ययन और वैदिक अनुष्ठानों का प्रतिषेध किया गया है–जैसे कि–“शूद्र चलता फिरता श्मशान है इसलिए उसके समीप वेदाध्ययन नहीं करना चाहिए” शूद्र पशुतुल्य ही है यज्ञ के योग्य ankurnagpal108@gmail.com

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