भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५३५ ) नहीं हैं” इत्यादि । जिसके लिए वेद श्रवण तक विहित नहीं है, उसके लिए वेदाध्ययन, वेदार्थज्ञान और वेदानुष्ठान आदि तो कभी संभव ही नहीं हैं । इसलिए वे सब भी उसके लिए प्रतिषिद्ध ही हैं । स्मृतेश्च ।१।३।३६॥ स्मर्यते च श्रवणादि निषेधः “अथ हास्यवेदमपशृण्वतस्त्रपुज- तुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणमुदाहरणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेदः” इति । “न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत्” इति च । अतः शूद्रस्यानधिकार इति सिद्धम्। श्रवण आदि का निषेध स्मृति में भी जैसे-“वेद सुनने वाले शूद्र के कानों को गर्म लोह और शीशे से पूर्ण करो, वेदपाठ करने पर जीभ काट लो, याद कर लेने पर शरीर काट दो” इत्यादि । “इसे धर्म का उपदेश मत दो, न व्रतानुष्ठान का ही उपदेश दो”। इत्यादि से शूद्र का अनधि- कार सिद्ध होता है । ये तु निर्विशेषचिन्मात्र ब्रह्मैव परमार्थः, अन्यत् सर्वंमिथ्याभूतम् बंधश्चापारमार्थिकः, स च वाक्यजन्यवस्तुयाथात्म्यज्ञानमात्रनिवर्त्यः, तन्निवृत्तिरेवमोक्षः इति वदंति, तै ब्रह्मज्ञाने शूद्रादेरनधिकारो वक्तुं न शक्यते । अनुपनीतस्य अनधीतवेदस्याश्रुतवेदांतवाक्यस्यापि यस्मात्कस्मादपि निर्विशेषचिन्मात्रं ब्रह्मैव परमार्थोऽन्यत्सर्वम् तस्मिन् परिकल्पितं मिथ्याभूतमिति वाक्याद्वस्तुयाथात्म्यज्ञानो- त्पत्तेः, तावतैव बंधनिवृत्तेश्च । ( शांकरमत निरसन ) जो लोग निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म को ही सत्य और सबको मिथ्या तथा देहादिबंधन को असत्य और तत्त्वमसि आदि वाक्य जन्य ज्ञान से बंधन की निवृति तथा उस निवृत्ति को ही मोक्ष मानते हैं वे तो शूद्रों के वेदों के अनधिकार की बात कह ही नहीं सकते । उनके उक्त मत के अनुसार तो, अनुपनीत—वेदाध्ययन रहित— वेदांतवाक्यों से अपरिचित जिस किसी भी व्यक्ति को “निर्विशेष चिन्मात्र