श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 599, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें“न चास्योपदिशेद्धर्मम्” इत्यादिना वेदविदः शूद्रादिभ्यो न वदंतीति च न शक्यं वक्तुम्, तत्त्वमस्यादि वाक्यावगत ब्रह्मात्म- भावानां वेदशिरसि वर्त्तमानतया दग्धाखिलाधिकारत्वेन निषेध- शास्त्रकिंकरत्वाभावात् अतिक्रांतनिषेधैर्वा कैश्चिदुक्ताद्वाक्यात् शूद्रादेः ज्ञानमुत्पद्यत एव । आप यह भी नहीं कह सकते कि-“न चास्योपदिशेद्धर्मम्” इत्यादि वाक्यों से, वेदवेत्ता शूद्रों को उपदेश देने का विरोध करते हैं; क्यों कि- जिन्हें “तत्त्वमसि” आदि वाक्यों से ब्रह्मात्मभाव का परिज्ञान हो गया है, वे तो वेदों से भी अतीत स्थिति को प्राप्त कर चुके, उनके तो सारे ही कर्म बन्धन दग्ध हो चुके, वे तो शास्त्रीय निषेध के दास हो नहीं सकते वे तो निषेध का अतिक्रमण करके शूद्र को तत्त्वोपदेश देंगे, शूद्र को तो ज्ञान हो ही जायगा । न च वाक्यं शुक्तिकादौ रजतादिभ्रम निवृत्तित्त्वत् पौरुष