भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५३८ ) ज्ञातृज्ञेयविकल्परूपं कृत्स्नं जगच्चाध्यस्तमिति निश्चित्यैवम्भूत- परिशुद्ध प्रत्यग्वस्तुन्यनवरतभावनया विपरीतवासनां निरस्य तदेव प्रत्यग्वस्तु साक्षात्कृत्य शूद्रादयोऽपि विमोक्ष्यन्त इति मिथ्याभूत- विचित्रैश्वर्य विचित्रसृष्ट्याद्यलौकिकानंतविशेषावलम्बिना वेदांत वाक्येन न किंचित् प्रयोजनमिह दृश्यत इति शूद्रादीनामेव ब्रह्म- विद्यायामधिकारः सुशोभनः। अनेनैव न्यायेन ब्राह्मणादीनामपि ब्रह्मवेदनसिद्धेरुपनिषच्च तपस्विनी दत्तजलांजलिः स्यात्। आप यह नहीं कह सकते कि—सीप आदि में, रजतभ्रमनिवृत्ति की तरह, विद्वान् पुरुष के उपदेशात्मक वाक्य से शूद्र का जगद्भ्रम निवृत्त नहीं हो सकता, ठीक है—तत्त्वमसि वाक्य श्रवण के बाद बहुत से ब्राह्मणों की भी तो भ्रमनिवृत्ति नहीं होती। यदि कहें कि-निदिध्यासन से द्वैतवासना के निरस्त हो जाने पर ही निवर्त्तक ज्ञान होता है; सो यह नियम तो उपदेशात्मक वाक्य में शूद्रों के लिए भी लागू हो सकता है, कोई ब्राह्मण के लिए ही तो निदिध्यासन का विशेष नियम नहीं। तत्त्व के प्रतिपादन में समर्थ ब्रह्मात्मभाव बोधक वाक्य विषयक भावना (चिन्तन के प्रवाह) को ही तो निदिध्यासन कहते हैं, यह भावना ही तो तद्विषयक विपरीत वासना की निवृत्ति करती है, यही निदिध्यासन का फल है। वेदानुशीलन को भी ज्ञानेच्छा उत्पादन का, उपयोगी कहा जाता है। इसी प्रकार महापुरुष के उपदेश वाक्य से ज्ञानेच्छा होने पर निदि- ध्यासनादि द्वारा विपरीत संस्कार के निवृत्त हो जाने पर शूद्र को भी तत्त्वज्ञान हो जायगा और उसी से असत् बंधन की भी निवृत्ति हो जायगी। अथवा आपके मतानुसार यह भी तो संभव है कि—जो निर्विशेष और स्वप्रकाश चैतन्यमय परमात्मा से बहुविध विचित्रतापूर्ण ज्ञातृ ज्ञेय कल्पनात्मक समस्त जगत समारोपित है, तर्क सम्मत प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण की सहायता से ज्ञानार्जन करके, शुद्ध चैतन्य परमात्मा की निरन्तर भावना करके, जगत सत्यता के उस भ्रांत संस्कार का निराकरण करके, सर्वव्यापी प्रत्यक्ष चैतन्य का साक्षात्कार करके, शूद्र आदि भी मुक्तिलाभ कर सकते हैं। मिथ्याभूत विचित्र ऐश्वर्य और विचित्र सृष्टि