श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५३६ ) आदि अनंत अलौकिक विशेषावगाही वेदांत वाक्य का यहाँ कोई प्रयोजन तो दीखता नहीं उक्त प्रकार से ही शूद्रादि का ब्रह्मविद्या में अधिकार समधिक शोभित होता है। ब्राह्मणादि को भी उक्त नियम से ही, ब्रह्म- ज्ञान सिद्धि संभावना के लिए तपस्विनी उपनिषद् देवी को जलांजलि देनी होगी। न च वाच्यं नैसर्गिक लोक व्यवहारे भ्राम्यतोऽस्य केनचिदयं लौकिकव्यवहारोभ्रमः, परमार्थस्त्वेवमिति समर्पिते सत्येव प्रत्यक्षानुमानवृत्त बुभुत्सा जायत इति तत्समर्पिका श्रुतिरप्यास्थेयेति, यतो भवभयभीतानां सांख्यादय एव प्रत्यक्षानुमानाभ्यां वस्तुनि- रूपणं कुर्वन्तः प्रत्यक्षानुवृत्तबुभुत्सां जनयंति बुभुत्सायां च जातायां प्रत्यक्षानुमानाभ्यामेव विविक्तस्वभावाभ्यां नित्यशुद्धस्वप्रकाशा- द्वितीयकूटस्थ चैतन्यमेव सत्, अन्यत्सर्वं तस्मिन्नध्यस्तमिति सुविवेचनम्। एवंभूते स्वप्रकाशिनि वस्तुनि श्रुति समधिगम्यं विशेषांतरं च नाभ्युपगम्यते— आप यह भी नहीं कह सकते कि—लोक अनादि काल से स्वाभाविक लौकिक व्यवहार में विभ्रान्त है, "यह समस्त लौकिक व्यवहार भ्रमात्मक है, परमार्थ वस्तु अमुक है" किसी सुबुद्ध व्यक्ति के द्वारा ऐसा बतलाने पर ही, इस लोक में प्रत्यक्ष और अनुमानावगत बुभुत्सा (बोधेच्छा) उत्पन्न हो सकती है, इसलिए तदनुकूल श्रुति का आश्रय लेना आव- श्यक है। इस प्रकार तो निरीश्वरवादी सांख्य आदि भी, भव भयभीत प्राणियों में, प्रत्यक्ष और अनुमान की सहायता से वस्तु का निरूपण करते हुए, प्रत्यक्षानुमान विषयक व्यावहारिक बुभुत्सा जाग्रत करते हैं। उस बुभुत्सा के जागरित होने पर तो, निर्दोष प्रत्यक्ष और अनुमान की सहा- यता से, नित्यशुद्ध स्वप्रकाश अद्वितीय चैतन्य कूटस्थ ही सत् , और बाकी सब उसी से अध्यस्त सिद्ध होते हैं। इस प्रकार स्वप्रकाश वस्तु में, अन्यान्य श्रौत धर्म भी स्वीकृत नहीं होते क्यों कि—आपके मतानुसार श्रुति तो एकमात्र, अध्यस्त मिथ्या रूप का ही निर्वर्तन करती है। ankurnagpal108@gmail.com