श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४१ ) कम्पनात् ॥१।३।४०॥ “अंगुष्ठ मात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति” अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा “इत्यनयोर्वाक्ययोर्मध्ये” यदिदं किच् जगत्सर्वं प्राण एजति निस्सृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवंति। भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपतिसूर्यः, भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्यु- र्धावति पंचमः।” इति कृत्स्नस्य जगतोऽग्निसूर्यादीनां चास्मिन्नं- गुष्ठ मात्रे पुरुषे प्राणशब्दे निर्दिष्टे स्थितानां सर्वेषां ततो निस्सृतानां तस्मात्सञ्जातमहाभयनिमित्तं एजनकम्पनं श्रूयते। तच्छासनातिवृत्तौ किं भविष्यतीति, महतो भयाद् वज्राद् इवोद्यतात् कृत्स्नं जगत् कंपत् इत्यर्थः। “भयादस्याग्निस्तपति” इत्यनेनैकार्थ्यात् “महद्भयं वज्रमुद्यतम्” इतिपंचम्यर्थे प्रथमा। अयं च परस्यब्रह्मण- स्स्वभावः “एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचंद्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः” भीषाऽस्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः, भीषाऽस्मादग्नि- श्चेन्द्रश्च, मृत्युर्धावति पंचमः” इति परस्य ब्रह्मणः पुरुषोत्तमस्यैवं विधैश्वर्यावगतेः । “अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला पुरुष शरीर के मध्य के हृदयाकाश में स्थित है “अंगुष्ट मात्र पुरुष अंतरात्मा है” इन दोनों वाक्यों के मध्य में ही— “परब्रह्म परमेश्वर से उत्पन्न यह सारा जगत, उस प्राण स्वरूप घरमेश्वर में ही चेष्टा करता है, इस उठे हुए वज्र के समान महान् भय स्वरूप परमेश्वर को जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं, उसी भय से अग्नितपता है, सूर्यंतपता है, इसी के भय से इन्द्र, वायु और पांचवे देवता मृत्यु अपने-अपने कार्यों में संलग्न हैं ।” इत्यादि वर्णन भी मिलता है जिसका तात्पर्य है कि-समस्त जगत अग्नि सूर्यादि सहित, प्राण शब्द निर्दिष्ट इस अंगुष्ठ परिमाण पुरुष में ही स्थित हैं और उसी से प्रकट होकर उसके ही संयमन में, भयभीत होकर संसार कर्म को नियमित रूप से कर रहे हैं। इसमें जो भय से कंपित होने वाली बात लिखी है, उसका ankurnagpal108@gmail.com