श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४२ ) तात्पर्य है कि-उसका शासन का अतिक्रमण करने पर अनिष्ट होगा, इस महान् भय से उठे हुए वज्र के समान उससे सारा जगत कांपता है । “भयादग्निस्तपति” का जो अर्थ है वही “महद्भयं” इत्यादि का भी है, द्वितीय वाक्य मे पंचमी अर्थ की द्योतिका प्रथमा विभक्ति है । उक्त परब्रह्म के स्वभाव को-“हे गार्गि ! इस अक्षर के प्रशासन में सूर्य और चंद्र स्थित हैं, इसके भय से वायु डोलता है, सूर्य उदय होता है, इसी के भय से अग्नि-चंद्र और पांचवा मृत्यु कार्य में संलग्न है” इत्यादि परब्रह्म पुरुषोत्तम के ऐश्वर्य बोधक वाक्यों से भी जाना जा सकता है । इतश्चांगुष्ठ प्रमितः पुरुषोत्तमः— ज्योतिर्दर्शनात् । १।३।४१॥ तयोरेवांगुष्ठ प्रमितविषययोर्वाक्ययोर्मध्ये परब्रह्मसाधारणं सर्वं तेजसां छादकं सर्वतेजसां कारणभूतमनुग्राहकं चांगुष्ठ प्रमितस्य ज्योतिरीक्ष्यते-“न तत्र सूर्यो भाति न चंद्रतारकं नेमाविद्युतो भ्रांति कुतोऽयमग्निः, तमेव भान्तमनु भातिसर्वं तस्यभासा सर्वमिदं विभाति” इति । अयमेवश्लोक अथर्वणे परंब्रह्माधिकृत्यश्रूयते । पर ज्योतिष्ट्वं च सर्वत्रपरस्य ब्रह्मणः श्रूयते । यथा-“परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते”-तं देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम्- “अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते” इत्यादिषु । अतो अंगुष्ठ प्रमितः परं ब्रह्म । उन दोनों अंगुष्ठ प्रमित विषयक दोनों वाक्यों के बीच में परब्रह्म के असाधारण धर्म सर्वतेजोभिभावक एवं समस्त तेजों के कारण अनु- ग्राहक ज्योतिष रूप का जो वर्णन मिलता है, अंगुष्ठ प्रमित के लिए भी वैसी ही ज्योति का वर्णन मिलता है—“वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है, न चंद्रमा न तारों का समुदाय ही न ये बिजलियाँ ही प्रकाशित होती हैं, इस अग्नि की तो गणना ही क्या है; उसके प्रकाशित होने पर ही सूर्य आदि प्रकाशित होते हैं, उसी के प्रकाश से यह संपूर्ण जगत प्रकाशित होता है” यही श्लोक अथर्वण उपनिषद् में परब्रह्म के लिए कहा गया है,