भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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परब्रह्म के लिए ही सर्वत्र परंज्योति स्वरूप का प्रयोग किया गया है, जैसे कि—“परं ज्योति को प्राप्त कर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है” देवगण, उन्हें ज्योतियों की ज्योति, अमृत और वायु रूप से उपासना करते हैं “ये जो द्युलोक से ऊपर ज्योति प्रकाशित हो रही है ।” इत्यादि, इससे सिद्ध होता है कि-अंगुष्ठ प्रमित परमात्मा ही है । १० अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाधिकरण :- आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ।१।३।४२॥ छांदोग्ये श्रूयते-“आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतं स आत्मा” इति । तत्र संशयः किमया- माकाश शब्द निर्दिष्टो मुक्तात्मा, उत परमात्मा—इति किं युक्तम् ? मुक्तात्मेति, कुतः ? “अश्व इव रोमाणि विधूय पापं, चंद्र इव राहोर्मुखात् प्रमुच्य, धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभि- संभवामि” इति मुक्तस्यानंतर प्रकृतत्वात् “ते यदंतरा” इति च नामरूपविनिर्मुक्तस्य तस्याभिधानात् “नामरूपयोर्निर्वहिता” इति च स एव पूर्वावस्थयोपलिलक्षयिषतः स एव हि देवादि रूपाणि नामानि च पूर्वमबिभः, तस्यैव नामरूपविनिर्मुक्ता सांप्रतिक्यवस्था “तद्ब्रह्म तदमृतम्” इत्युच्यते आकाशशब्दश्च तस्मिन्नप्यसंकुचित प्रकाशयोगादुपपद्यते । ननु दहर वाक्यशेषत्वादस्य स एव दहरा- काशोऽयमिति प्रतीयते, तस्य च परमात्मत्वं निर्णीतम् ।मैवं, प्रजा- पति वाक्य व्यवधानात् । प्रजापति वाक्ये च प्रत्यगात्मनो मुक्त्यवस्थान्तं रूपमभिहितम्, अनन्तरं च “विधूय पापम्” इति स एव मुक्तावस्था प्रस्तुतः । अतोऽत्राकाशो मुक्तात्मा । छांदोग्योपनिषद का वाक्य है—“आकाश ही नाम और रूप का निर्वाहक है, ये नामरूप जिसके अन्तर्यामी हैं, वही ब्रह्म, वही अमृत

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