भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५४४ ) वही आत्मा है" इत्यादि । इस पर संशय होता है कि - आकाश शब्द निर्दिष्ट मुक्तात्मा है या परमात्मा ? कह सकते हैं कि मुक्तात्मा, क्यों कि "जैसे कि घोड़ा रोंए झाड़कर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार मैं पापों को धोकर, राहुके मुख से निकले चन्द्रमा के समान शरीर त्याग कर कृतकृत्य हो, नित्य ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूँ" ऐसा मुक्तात्मा का वर्णन मिलता है। "वह नाम और गुण उसके अन्तर्गत हैं" इस वाक्य में नाम रूप से मुक्त उसका वर्णन प्रतीत होता है "वह नाम रूप का निर्वाहक है" इस वाक्य में भी, इसी की, सृष्टि की पूर्व स्थिति का वर्णन किया गया है । उसने ही पहिले देवादि रूपों में बहुत से नाम धारण किये, वही ब्रह्म, वही अमृत है" इस वाक्य में भी उसी की नाम रूप रहित अवस्था का वर्णन है । अव्याहत प्रकाश से संबद्ध होने से, उसे ही आकाश कहा गया है । यह प्रकरण दहर वाक्य का शेषांश है इसलिए यह वर्णन दहरा- काश का ही प्रतीत होता है, दहराकाश परमात्मा ही है, यह निर्णय कर ही चुके हैं, इसलिए यह परमात्मा का वर्णन है, इत्यादि शंका नहीं की जा सकती, क्यों कि दहर प्रकरण और इस प्रकरण के मध्य में प्रजापति वाक्य का व्यवधान है। प्रजापति वाक्य में जीवात्मा की मुक्तावस्था का ही वर्णन है, उसके बाद ही "पापों को धोकर" वाक्य भी मुक्तात्मा का ही बोधक है। इससे सिद्ध होता है कि मुक्तात्मा ही आकाश है । सिद्धान्तः - इति प्राप्त उच्यते-आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् इति आकाशः परब्रह्म, कुतः ? अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् । अर्थान्तर व्यपदेशस्तावत्- "आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता" इति नाम- रूपयोः निर्वोढृत्वं बद्धमुक्तोभयावस्थात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरत्वमा- काशस्योपपादयति । बद्धावस्थः स्वयं कर्मवशान्नामरूपे भजमानो न नामरूपे निर्वोढु शक्नुयात्, मुक्तावस्थस्य जगद्व्यापारासंभवात् न नितरां नामरूपनिर्वोढृत्वम् । ईश्वरस्य तु सकल जगन्निर्माण धुरंधरस्य नामरूपयोः निर्वोढृत्वम् श्रुत्यैव प्रतिपन्नम्- "अनेन ankurnagpal108@gmail.com