भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५४६ ) चरितार्थ करने के लिए, नामरूप का निर्वाह करता है । सूत्र में प्रयुक्त आदि शब्द का तात्पर्य है-ब्रह्मत्व आत्मत्व और अमृतत्त्व । अहैतुक महानतां आदि गुण परमात्मा में ही संभव हैं इसलिए इस प्रकरण का उपदिष्ट आकाश तत्त्व, परब्रह्म का ही रूप है । यत् पुनरुक्तं "धूत्वा शरीरम्" इति मुक्तोऽनंतर प्रकृत. इति तन्न, 'ब्रह्मलोकमभिसंभवामि" इति परस्यैव ब्रह्मणोऽनन्तर प्रकृतत्वात् । यद्यप्यभिसंभवितुर्मुक्तस्याभिसंभाव्यतया परं ब्रह्मनि- र्दिष्टम्, तथाप्यभिसंभवितुर्मुक्तस्य नामरूपनिर्वोढृत्वाद्यसंभावाद- भिसंभाव्यं परमेव ब्रह्म तत्र प्रत्येतव्यम् । “धूत्वाशरीरम्" यह परवर्त्ती वाक्य, मुक्त अवस्था वाले जीवात्मा के लिए कहा गया है, यह कथन भी असगत है, “ब्रह्मलोक को प्राप्त होऊँगा" यह वाक्य, उपर्युक्त वाक्य के ठीक बाद का जो कि परमात्मा के लिए कहा गया है । यद्यपि, ब्रह्मभाव लब्ध मुक्तपुरुष का प्राप्य रूप परब्रह्म ही कहा गया है, तथापि, उस ब्रह्मभाव लब्ध मुक्त पुरुष मे जब, नाम रूप निर्वाक्त्व है नहीं, तो अभिसद्भाव्य परमात्मा को ही निर्वाहक मानना पड़ेगा । कि च आकाश शब्देन प्रकृतस्य दहराकाशस्यात्र प्रत्यभिज्ञानात् प्रजापतिवाक्यस्याप्युपासक स्वरूप कथनार्थत्वादुपास्य एव दहरा- काशः प्राप्यतयोपसंह्रियत इति युक्तम् । आकाश शब्दश्च प्रत्यगा- त्मनि न कश्चिद् दृष्टचरः । अतोऽत्राकाशः परंब्रह्म । उक्त प्रकरण में, आकाश शब्द से प्रस्तावित दहराकाश ही निर्दिष्ट है, मध्यवर्त्ती प्रजापति वाक्य का तात्पर्य, उपासक के स्वरूप का कथन मात्र है, इस जगह उपास्य रूप से दहराकाश को ही प्राप्य बतलाकर उपसंहार किया गया है, यही मानना युक्ति संगत है । आकाश शब्द का, जीवात्मा के लिए कहीं भी प्रयोग दिखलाई नही देता । इसलिए निश्चित होता है कि उक्त प्रकरण में आकाश शब्द, परब्रह्म का ही वाचक है । ankurnagpal108@gmail.com