भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५४७ ) अथस्यात्-प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतमात्मान्तरमेव, नास्ति, ऐक्योपदेशात् द्वैत प्रतिषेधाच्च। शुद्धावस्थ एव हि प्रत्यगात्मा, परमात्मा परंब्रह्म परमेश्वर इति च व्यपदिश्यते, अतः प्रकृतान्मुक्ता- त्मनोऽभिसंभवितुनार्थान्तरमभिसन्भाव्यो ब्रह्मलोकः अतोनामरूपयो- र्निर्वहिता आकाशोऽपि स एव भवितुमर्हति-इति। अत उत्तरं पठति- श्रुति वाक्यों के अद्वैत वर्णन और द्वैत के प्रतिषेध से ज्ञात होता है कि-जीवात्मा से पृथक् किसी अन्य का अस्तित्व नहीं है, शुद्ध अवस्था वाला जीवात्मा ही, परमात्मा, परब्रह्म, परमेश्वर आदि नामों से उल्लेख्य है अभिसद्‌भविता ( ब्रह्मभाव प्राप्त ) मुक्तात्मा से अभिसद्भाव्य (प्राप्य) ब्रह्मलोक कोई भिन्न वस्तु नहीं है, इसलिए नाम रूप का निर्वाहक आकाश भी जीवात्मा ही है। इस भ्रांति का उत्तर सूत्रकार देते हैं-- सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥१।३।४३॥ व्यपदेशादिति वर्तते, सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरत्वेन परमात्मनो व्यपदेशात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतः परमात्माऽस्त्येव । तथाहि-वाजसनेयके-"कतम आत्मायोऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु" इति प्रकृतस्य प्रत्यगात्मनः सुषुप्त्यवस्थायामकिंचिद्ज्ञस्य सर्वज्ञेन पर- मात्मना परिष्वंग आम्नायते-"प्राज्ञेनात्मनासंपरिष्वक्तो न बाह्यं वेद नान्तरम्" इति। तथोत्क्रांतावपि- "प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन- न्द्याति" इति । न च स्वपत उत्क्रामतो वा किंचिद् ज्ञस्य तदानीमेव स्वेनैव सर्वज्ञेन सतापरिष्वंगान्वारो हौ संभवतः न च क्षेत्रज्ञान्तरेण तस्यापि सर्वज्ञत्वासंभवात् । जीवात्मा के लिए सुषुप्ति और उत्क्रांति इन दो अवस्थाओं का वर्णन मिलता है, जिससे, जीवात्मा-परमात्मा का भेद स्पष्ट हो जाता है, इसलिए जीव से भिन्न परमात्मा नामक कोई तत्त्व है यह मानना