श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४८ ) होगा । जैसा कि-वाजसनेय उपनिषद् में—"आत्मा कौन है ? जो कि— प्राणों के मध्य में विज्ञानमय नामवाला है" इत्यादि उपक्रम के बाद, सामान्य अज्ञ जीवात्मा का सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ परमात्मा से मिलन बतलाया गया है जैसे कि—"प्राज्ञ परमात्मा से मिलकर बाह्याभ्यंतर ज्ञान से शून्य हो जाता है।" तथा उत्क्रान्ति में भी जैसे—"प्राज्ञ परमात्मा से अधिष्ठित होकर ( जीव ) शरीर त्याग कर जाता है।" इन दोनों वर्णनों से स्पष्ट हो जाता है कि—जीवात्मा और परमात्मा भिन्न हैं, एक नहीं है, एक ही वस्तु में अज्ञता और प्राज्ञता, एकीभाव और प्रतिष्ठान आदि विलक्षणतायें संभव नहीं हैं और न क्षेत्रज्ञ जीवात्मा का साहचर्य ही संभव हैं क्योंकि—उसमें सर्वज्ञता का अभाव है। इतश्च प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतः परमात्मेत्याह— इसलिए भी जीवात्मा को परमात्मा से भिन्न बतलाया जाता है कि— पत्यादिशब्देभ्यः : १।३।४४॥ अयं परिष्वंजकः परमात्मा उत्तरत्र पत्यादिशब्दैः व्यपदिश्यते 'सर्व- स्याधिपतिः सर्वस्यवशी सर्वस्येशानः स न साधुनाकर्मणा भूयान्नो एव असाधुना कनीयान्, एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपालन एष सेतुः विधरण एषां लोकानामसंभेदाय, तमेतंवेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषंति एतमेव विदित्वा मुनिर्भवति, एतमेव प्रत्राजिनो लोक- मिच्छन्तः प्रव्रजंति"—"स वा एष महानज आत्माऽन्नादोवसुदानः"— अजरोऽमृतोऽभयोब्रह्म" इति एते च पतित्व जगद्विधरणत्व सर्वेश्वर- त्वादयः प्रत्यगात्मनि मुक्तावस्थेऽपि न कथंचिद् संभवंति । अतो मुक्तात्मनोऽर्थान्तरभूतो नामरूपयोनिर्वहिता आकाश. । ऐक्योप- देशस्तु सर्वस्य चिदाचिदात्मकस्य ब्रह्मकार्यत्वेन तदात्मकत्वायत्त इति "सर्वंखल्विदं ब्रह्म तज्जलान" इत्यादिभिर्वाक्यैः प्रतिपाद्यत इति पूर्वमेव समर्थितम् । द्वैत प्रतिषेधश्च तत एषेत्यनवद्यम् ।