श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५५३ ) इन्द्रिय, इन्द्रिय के विषय, रथी और रथ आदि के रूप में कल्पना की गई है रथ रूप से उल्लेख्य शरीर को ही अव्यक्त शब्द से प्रस्तुत किया गया है । यह रूपक उक्त प्रकरण के पूर्व का ही है । रूपक इस प्रकार है—"आत्मा को ही रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी, और मन को लगाम समझो, इन्द्रियों को घोड़ा, विषयों को उनकी विचरण भूमि" इत्यादि से लेकर "वही संसार मार्ग से पार वैष्णव पद को प्राप्त करते हैं" इस अंतिम वाक्य तक, संसार मार्ग से पार वैष्णव पद को प्राप्त करने की इच्छावाले उपासक को रथी रूप से एवं उसके शरीर आदि को रथ और रथांग अश्व आदि रूप से कल्पना करके; यह दिखलाया गया है कि जो इन रथ आदि को वश में रखता है, वही संसार मार्ग से पार जाकर वैष्णव पद प्राप्त करता है । रथादि रूप से कल्पित शरीर आदि के मध्य में जिन्हें वशीभूत करने की बात कही गई है, उनमें भी सर्व प्रधान, जिनको वशीभूत करना सर्वाधिक कष्ट साध्य है "इन्द्रियेभ्यः परा" इत्यादि में उन्हीं वृत्तियों को "परा" शब्द से उल्लेख किया गया है इस वशीकरण कार्य में, अश्वरूप से कल्पित इन्द्रियों की अपेक्षा, गोचर रूप से कल्पित विषयों का समूह प्रधान है । क्योंकि—जिन लोगों ने एक मात्र इन्द्रियों को संयमित कर भी लिया, विषयों से विरक्ति नहीं हुई तो प्रायः उनकी इन्द्रियां असंयत हो जाती हैं । प्रग्रह ( लगाम ) रूप से कल्पित मन, उन विषयों से भी प्रधान है, क्योंकि—मन के विरत होने पर ही विषयों की न्यूनता होती है । सारथी रूप से कल्पित बुद्धि, मन की अपेक्षा और भी प्रधान है, क्योंकि—बुद्धि के द्वारा अध्यवसाय न करने पर मन भी कुछ नहीं कर सकता । रथी रूप से कल्पित आत्मा, सर्वकर्त्ता होने के कारण, उस बुद्धि की अपेक्षा प्रधान है, क्योंकि उक्त सभी आत्मा- धीन हैं, इसलिए आत्मा को ही "महान्" ऐसा विशेष नाम वाला कहा गया है । रथ रूप से कल्पित शरीर, उस आत्मा की अपेक्षा प्रधान है, क्योंकि— शरीर ही, जीवात्मा के हर प्रकार के पुरुषार्थ साधन में, प्रवृत्ति प्रयोजक है । संसार मार्ग से पार सबके अन्तर्यामी, परम पुरुष परमात्मा उसकी अपेक्षा प्रधान हैं, क्योंकि पूर्वोक्त आत्मा पर्यन्त सभी पदार्थ समस्त प्रवृत्तियां, उन्हीं की इच्छाशक्ति के अधीन हैं, वे ही अंतर्यामी रूप से उपासना का भी निर्वाह करते हैं। "परात्त तच्छुतेः" इस सूत्र में जीवात्मा का कर्तृत्व, परं पुरुष के अधीन है, ऐसा बतलाते हैं। वे