भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५५४ ) परमात्मा ही आत्मवशीकरण और उपासना सिद्धि के उपायों में चरम उपाय एवं परं प्राप्य लक्ष्य हैं या परं पुरुषार्थ रूप हैं, यही बात "पुरुष से श्रेष्ठ कुछ नहीं है, वही परम अवधि और परम गति है" इस श्रुति में कहा गया है। तथा चान्तर्यामिब्राह्मणे “य आत्मनितिष्ठन्” इत्यादिभिः सर्वं साक्षात् कुर्वन्तः सर्वं नियमयतोत्युक्तवा “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” इति नियंत्रंतरं निषिध्यते । भगवद्गीतासु च-“अधिष्ठानंतथा कर्त्ता करणं च पृथग् विधं, विविधाश्च पृथग् चेष्टा दैव चैवात्र पंचमम्।” दैवमत्र पुरुषोत्तम एव “सर्वस्यचाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृति- र्ज्ञानमपोहनं च” इति वचनात् । तस्य च वशीकरणं तच्छरणागति- रेव । यथाह-‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति, भ्रामयन् सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया, तमेव शरणं गच्छ” इति । तदेवम् “आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादिना रथ्यादिरूपक विन्यस्ता इन्द्रिया- दयः “इंद्रियेभ्यः पराह्यर्थाः” इत्यत्र स्वशब्दैरेव प्रत्यभिज्ञायन्ते, न रथरूपितं शरीरमिति परिशेषात्तदव्यक्त शब्देनोच्यत इति निश्ची- यते । अतः कापिलतंत्रसिद्धस्य प्रधानस्य प्रसंग एव नास्ति । इसी प्रकार अन्तर्यामी ब्राह्मण में “य आत्मनितिष्ठन्” इत्यादि वाक्य में उस परमात्मा को सबका दृष्टा और नियामक बतलाकर “नान्योऽतो” इत्यादि में इसके अतिरिक्त किसी अन्य नियामक का निषेध किया गया है। भगवद्गीता में भी-“अधिष्ठान (शरीर) एवं कर्त्ता, अनेक प्रकार के करण (इन्द्रियाँ) पृथक्-पृथक् विविध चेष्टायें तथा पांचवां दैव, ये ही क्रिया प्रवृत्ति के कारण हैं।” इसमें दैव का तात्पर्य पुरुषोत्तम ही है ऐसा-“मैं ही सबके हृदय में संन्निविष्ट हूँ, मुझसे ही स्मरण, ज्ञान और अपोहन होते हैं”—इस वचन से ज्ञात होता है। उस परमात्मा को वशीकरण करने का उपाय उसकी शरणागति प्राप्त करना ही है। जैसा कि—इस गीता वाक्य से ज्ञात होता है-‘ईश्वर अपनी माया से, सबके हृदय में विराज कर, सारे जगत् को यंत्रमयी कठपुतली की