भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५३७ ) है। “तद् यच्छेद् ज्ञान आत्मनि” का अर्थ है, उस मन को बुद्धि में लीन करो इसमें ज्ञान शब्द से पूर्वोक्त बुद्धि ही लक्षित है। “ज्ञाने आत्मनि” में दो सप्तमी विभक्ति का प्रयोग है, जिसका तात्पर्यार्थ है आत्मा में वर्त्तमान ज्ञान में लीन करो। ‘ज्ञानं आत्मनि महति यच्छेद्’ का तात्पर्य है बुद्धि को महान कर्त्ता आत्मा में लीन करो। “तद् यच्छेद् शांत आत्मनि” का तात्पर्य है—उस कर्त्ता को परब्रह्म सर्वान्तर्यामी परमात्मा में लीन करो। इस वाक्य में तत् शब्द का नपुंसक लिंगात्मक प्रयोग, लिंग विपर्यय से हुआ है। ऐसा रथी ही वैष्णव पद प्राप्त कर सकता है, यही प्रकरण का तात्पर्य है। अव्यक्त शब्देन कथं व्यक्तस्य शरीरस्याभिधानम् ? इत्याह- अव्यक्त शब्द से, व्यक्त शरीर कैसे माना गया ? इसका निराकरण करते हैं - सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ।१।४।२।। भूतसूक्ष्ममव्याकृतं ह्यवस्था विशेष मापन्नं शरीरंभवः तदव्या- कृतमिह शरीरावस्थमव्यक्त शब्देनोच्यते । तदर्हत्वात्-तस्य अव्या- कृतस्य अचिद् वस्तुन एव विकारापन्नस्य रथवत् पुरुषार्थ साधन प्रवृत्त्यर्हत्वात् । अव्याकृत सूक्ष्म भूत ही, अवस्था विशेष योग से शरीर होते हैं। शरीर रूप विशिष्ट अवस्था को प्राप्त इन अव्याकृतों को ही यहाँ अव्या- कृत नाम से कहा गया है (अर्थात् अव्यक्त शब्द सूक्ष्मशरीर का वाची है) विकृतावस्था को प्राप्त अचित् वस्तु ही, रथ की तरह पुरुषार्थ साधन करने वाली है, यही उक्त कथन का तात्पर्य है। यदि भूतसूक्ष्ममव्याकृतमभ्युपगम्यते, कापिल तंत्रसिद्धोपादानेकः प्रद्वेष ? तत्रापि हि भूतकारणमेवाव्यक्तमित्युच्यते । तत्राह- अव्याकृत भूतसूक्ष्म को ही यदि अव्यक्त मानते हैं तो सांख्योक्त प्रकृति को ही मानने में क्या आपत्ति है ? वहाँ भी तो भूतकारण को ही अव्यक्त कहते हैं। इसका निराकरण करते हैं— ankurnagpal108@gmail.com