भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५५८ ) तदधीनत्वादर्थवत् ॥१।४।३॥ परमकारणभूत परमपुरुषाधीनत्वात् प्रयोजनवत् भूत सूक्ष्मम्। एतदुक्तं भवति-न वयमव्यक्तं तत्परिणाम विशेषांश्च स्वरूपेण नाभ्युपगच्छामः। अपितु परमपुरुष शरीरतया तदात्मकत्वविरहेण। तदात्मकत्वेनैव हि प्रकृत्यादयः स्वप्रयोजनं साधयंति, अन्यथा स्वरूप- स्थिति प्रवृत्ति भेदास्तेषां न स्युः, तथाऽनभ्युपगमादेव तंत्रसिद्ध प्रक्रियानिरसनम् इति। परम कारण परं पुरुष परमात्मा के अधीनस्थ अव्याकृत भूत सूक्ष्मों का एक विशेष प्रयोजन है। कथन यह है कि-हम लोग अव्यक्त और उसके विशेष-विशेष परिणामों को स्वतंत्र रूप से एकाएक ही स्वीकार नही कर लेते, अपितु परमपुरुष के शरीर तदात्मक होने से ही, उनकी कृति को मानते हैं, तदात्मक होकर ही प्रकृति आदि सभी, अपने प्रयोजनों को पूरा कर पाते है। यदि ऐसा न होता तो, उनके स्वरूप, स्थिति और प्रवृत्ति में भेद न होता उक्त प्रकार की प्रक्रिया सांख्यतंत्र में नहीं है, इसलिए सांख्यतंत्र प्रक्रिया का विरोध किया गया है। श्रुतिस्मृत्योर्हि जगदुत्पत्ति प्रलयवादेषु परमपुरुषमहिमवादेषु च प्रकृति विकृतिपुरुषास्तदात्मकाः संकीर्त्यन्ते, यथा-“पृथिव्यप्सु- लीयते” इत्यारम्भ-“तन्मात्राणि भूतादौलीयन्ते, भूतादिर्महति लीयते, महानव्यक्ते लीयते, अव्यक्तमक्षरेलीयते, अक्षरं तमसि लीयते, तमः परे देवएकीभवति” तथा-“शस्य पृथिवी शरीरं यस्यापः शरीरं, यस्य तेजः शरीरं यस्यवायुः शरीरं यस्याकाशः शरीरं यस्याहंकारः शरीरं यस्य बुद्धिः शरीरं यस्य अव्यक्तं शरीरं यस्याक्षरं शरीरं यस्य मृत्युः शरीरं एष सर्व भूतान्तरात्मा अपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” तथा- “भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनोबुद्धिरेव च, अहंकार इतीयं में प्रकृतिरष्टधा, अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मे पराम्, जीवभूतां ankurnagpal108@gmail.com