श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५६० ) व्यक्तज्ञविज्ञानात् मोक्षं वदद्भिस्तांत्रिकै स्तेषां सर्वेषां ज्ञेयत्वाभ्युपग- तात्, न चास्य ज्ञेयत्वमुच्यते, अतो न तंत्रसिद्धस्येह ग्रहणम् । यदि उपनिषदों में सांख्योक्त प्रधान को जगत का कारण माना गया होता तो, उसी को ज्ञेय भी कहा गया होता । व्यक्त-अव्यक्त और पुरुष, इन तीनों के विशेष ज्ञान से मोक्ष मानने वाले सांख्यवादी, इन तीनों को ज्ञेय मानते हैं, उपनिषदों में अव्यक्त को ज्ञेय नहीं मानते इसलिए श्रुतियों का प्रतिपाद्य, सांख्योक्त प्रधान नहीं है । वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् । १ । ४ । ५ ॥ “अशब्द मस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्चयत्, अनाद्य- मनंतं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्यु मुखात्प्रमुच्यते” इत्य- व्यक्तस्य ज्ञेयत्वमनंतरमेव वदतीयं श्रुतिरेति चेत्-तन्न, प्राज्ञः परम- पुरुष एवेत्यत्र श्लोके निचाय्यत्वेन प्रतिपाद्यते । “विज्ञानसारः यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः, सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते, दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्यासूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” इति प्राज्ञस्यैव प्रकृतत्वात् । अतएव- “पुरुषान्न परंकिंचिद् “इति न पंचविंशक पुरुषातिरिक्त तत्त्व निषेधः, तस्य च परं पुरुषस्याशब्दत्वादयो धर्माः “यत्तदद्रेश्यमग्राह्यम्” इत्यादि श्रुति प्रसिद्धाः । “महतः परम्” इत्यपि “बुद्धेरात्मा महान् परः” इति पूर्वप्रकृताज्जीवात्मनः परत्वमेवोच्यते । “शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध रहित, अनादि अनंत, महत् तत्त्व से भी परवर्ती, उस स्थिर वस्तु की उपासना करने से, मृत्यु से छुटकारा प्राप्त होता है” यह परवर्ती श्रुति तो अव्यक्त को ज्ञेय बतला रही है, ऐसी शंका करना भी ठीक नहीं है, प्राज्ञ परं पुरुष परमात्मा को ही इसमें उपास्य कहा गया है । “विज्ञान जिसका सारथी और मन जिसकी लगाम है, वही साधक, संसार मार्ग को पार कर विष्णु के परं पद को प्राप्त