श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५६१ ) करता है”—“यह सबका आत्म रूप परम पुरुष समस्त प्राणियों में रहता हुआ भी माया के परदे में छिपे रहने के कारण प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल सूक्ष्म तत्त्वों को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से देखा जाता है।” इत्यादि में प्राज्ञ परमात्मा को ही उपास्य रूप से बतलाया गया है। “पुरुषान्न परं किंचित्” इस वाक्य में भी पंचविंशक पुरुष से अतिरिक्त तत्त्व का निषेध प्रतीत नहीं होता। उस परम पुरुष की अशब्दत्व आदि जो विशेषतायें हैं, वे “अदृश्यमग्राह्यम्” इत्यादि वाक्यों में प्रसिद्ध हैं। “महतः परम्” वाक्य भी, “बुद्धेरात्मा महान् परः” इस पूर्वकथित वाक्य के जीवात्मा से पर तत्त्व, परमात्मा की ओर ही इङ्गन कर रहा है। त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च ॥१।४।६॥ अस्मिन् प्रकरणे हि उपायोपेयोपेतॄणां त्रयाणामेव चैवमुप- न्यासः ज्ञेयत्वेनोपन्यासः तद्विषयश्च प्रश्नो दृश्यते, नान्यस्या