भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५६७ ) हर प्रकार के बंधनों से मुक्त होता है । सर्वज्ञ और अज्ञानी, समर्थ और असमर्थ ये दो अजन्मा हैं, भोगने वाले जीव के लिए उपयुक्त सामग्री वाली अनादि प्रकृति एक तीसरी शक्ति है । परमात्मा अनंत रूपों वाला होते हुए भी, कर्त्तापन के अभिमान से रहित है । जीवात्मा जब जीव, माया और ईश्वर इन तीनों के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है तो ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । प्रकृति विनाश शील है, पर उसको भोगने वाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अविनाशी है । इस विनाश शील और अमृत दोनों को परमात्मा अपने वश में रखता है । उस परमेश्वर का निरन्तर ध्यान करने से, मन को उसमें लगाये रहने से तथा तन्मय हो जाने से अंततोगत्वा, समस्त माया की निवृत्ति हो जाती है । छंद-यज्ञ-व्रत आदि तथा जिसका भी भूत-भविष्य-वर्त्तमान रूप से वेद वर्णन करते हैं ऐसे संपूर्ण जगत को, मायाधीश परमेश्वर भूत समुदाय से रचता है, मायाधीन जीवात्मा इस प्रपंच में बँधा हुआ है । माया प्रकृति तथा मायापति महेश्वर को जानना चाहिए, उसी के अंगरूप कारण और कार्य से यह सारा जगत व्याप्त है । प्रकृति और जीवात्मा का स्वामी, समस्त गुणों का शासक, जन्म मृत्यु संसार में बांधने वाला, स्थिति रखने वाला, और उससे मुक्त करने वाला परमात्मा है ।” इत्यादि । स्मृतिरपि—“प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि, विका- रांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृति संभवान् । कार्यकारण कर्त्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते, पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते । पुरुषः प्रकृतिस्थोऽहि भुंक्ते प्रकृतिजान् गुणान्, कारणं गुण संगोऽस्य सदस- द्योनि जन्मसु । सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति संभवाः, निबध्नंति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ।” तथा—“सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यांति मामिकाम्, कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् । प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः, भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् । मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्, हेतुनानेन कौन्तेय जगद् हि परिवर्तते” तस्माद् ब्रह्मात्मकत्वेन कापिल तंत्र- सिद्धाः प्रकृत्यादयो निरस्यंते । ankurnagpal108@gmail.com