भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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( ५६८ ) स्मृति में भी इसी प्रकार जैसे—"प्रकृति-पुरुष दोनों को ही अनादि जानों, विकारों और गुणों को प्रकृति से ही उत्पन्न जानों। कार्य कारण में प्रकृति कारण कहलाती है, सुखदुःख भोगने में पुरुष कारण कहलाता है। पुरुष, प्रकृति में स्थित हुआ ही, प्राकृतिक गुणों को भोगता है, गुणों की आसक्ति ही उसकी ऊंची-नीची योनि के जन्म का कारण है। सत्व रज तम आदि प्राकृतिक गुण ही, अव्यय आत्मा को देह में बांधते हैं।" तथा "कल्प के अंत में सारे भूत, मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं, कल्प के आदि में मैं पुनः उनकी सृष्टि करता हूँ। प्रकृति के वशीभूत विवश समस्त भूत समुदाय को मैं, अपनी प्रकृति का अवलंबन कर, अनेक प्रकार से बार-बार सृजन करता हूँ। मुझ अध्यक्ष द्वारा प्रेरित, प्रकृति, समस्त चराचर जगत को उत्पन्न करती है, इसी से यह जगत चलता रहता है।" इत्यादि उदाहरणों से अब्रह्मात्मक सांख्य तंत्र सिद्ध प्रकृति आदि का स्वतः खंडन हो जाता है। श्वेताश्वतरोपनिषदि श्रूयते—"अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सुजमानां सरूपाः, अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः" इति । तत्र संदेहः, किमस्मिन् मंत्रे केवला तंत्र सिद्धा प्रकृतिरभिधीयते, उत ब्रह्मात्मिका ? इति, किं युक्तम् ? केवलेति, कुतः ? "अजामेकाम्" इत्यस्याः प्रकृतेरकार्यत्व श्रवणात्, “बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः” इति स्वातन्त्र्येण सरूपाणां बह्वीनां प्रजानां स्रष्टृत्वत्व श्रवणात् । इति । श्वेताश्वतरोपनिषद् में प्रसंग आता है कि—"अपने ही समान भूत समुदायों को रचने वाली रक्त-श्वेत और कृष्ण वर्णा एक अजा को, निश्चय ही एक अज आसक्त होकर भोगता है, दूसरा अज इस भोगी हुई श्रजा को त्याग देता है।" इस पर संदेह होता है कि—इस मंत्र में सांख्योक्त केवला (स्वतः सिद्धा) प्रकृति का वर्णन है अथवा ब्रह्मात्मिका प्रकृति का ? कह सकते हैं कि केवला का, क्यों कि—"अजामेकाम्" पद में प्रकृति की अकार्यता बतलाई गई है तथा "बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः" इस वाक्यांश में, अपने ही समान प्रजा का स्वतंत्र रूप से सर्जन कहा