भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५६६ ) गया है, जिससे ज्ञात होता है कि-सांख्य तंत्र सिद्ध केवला का ही वर्णन है । एवं प्राप्तेऽभिधीयते—“चमसवदविशेषात्”। न जायत इति अजा इति अजात्वमात्र प्रतिपादनात् तंत्रसिद्धाब्रह्मात्मकाजाग्रहणे विशेषाप्रतीतेः चमसवत्, यथा—“अर्वाग्विलश्चमश ऊर्ध्वबुध्नः” इत्यस्मिन् मंत्रे चमसस्य भक्षणसाधनत्वमात्रं चमसशब्देन प्रतीयत इति न तावन्मात्रेण चमसविशेष प्रतीतिः, यौगिकशब्दानामर्थ- प्रकरणादिभिर्विनाऽर्थविशेषनिश्चयायोगात्, तत्र “यथेदं तच्छिरः एष हि अर्वाग्विलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः” इत्यादिना वाक्यशेषेण शिरसः चमसत्वनिश्चयः, तथा अत्रापि अर्थ प्रकरणादिभिरेव अजा निर्णोतव्या, न चात्र तंत्रसिद्धा अजाग्रहणहेतवोऽर्थ प्रकरणादयो दृश्यन्ते, नचास्याः स्वातंत्र्येन स्रष्टृत्वत्वं प्रतीयते “बह्वीः प्रजाः सृजमानां” इति स्रष्टृमात्रप्रतीतेः । अतोऽनेन मंत्रेण न अब्रह्मात्मि- काऽजाऽभिधीयते । उक्त संशय पर “चमसवदविशेषात्’ सूत्र प्रस्तुत करते हैं, जिसका तात्पर्य है कि-इस प्रसंग में सांख्योक्त प्रकृति का वर्ण'न नहीं है, जो जन्म न ले उसे अजा कहते हैं, ऐसी सामान्य अजा का ही प्रतिपादन किया गया है। इससे सांख्योक्त अब्रह्मात्मक अजाविशेष की प्रतीति नहीं होती, जैसे कि-‘अर्वाग्विलश्चमस’’ इत्यादि मंत्र में चमस शब्द भक्षण के साधनत्व मात्र का ही बोधक है, चमसविशेष की प्रतीति नहीं कराता । यौगिक शब्दों का अर्थ, प्रकरण आदि के बिना, अर्थ विशेष का बोधक नहीं होता । जैसे कि—“यथेदं तच्छिरः” इत्यादि वाक्य के शेषांश से चमस शब्द, शिर अर्थ की प्रतीति कराता है, उसी प्रकार उक्त प्रसंग में भी, प्रकरण आदि से ही अजा शब्द का अर्थ निर्णय करना होगा । प्रकरण आदि में कहीं भी सांख्योक्त अजा की अर्थ प्रतीति नहीं होती, और न उसकी स्वतंत्र रूप से सृष्टि करने की ही प्रतीति होती है । “बह्वीः प्रजाः ankurnagpal108@gmail.com

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