भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५७२ ) “प्रकृति को माया तथा महेश्वर को मायाधीश जानो, उसी के अंगभूत कारण समुदाय से यह संपूर्ण जगत् ब्याप्त है ।” इन सब से ब्रह्मात्मिका अजा की ही प्रतीति हो रही है । सांख्य तंत्रोक्त, स्वतंत्र स्वभावा अजा की तो इस मंत्र में लेशमात्र भी चर्चा नहीं है । कथं तर्हि ज्योतिरुपक्रमाया लोहित शुक्ल कृष्ण रूपाया अस्याः प्रकृतेरजात्वम्, अजाया वा कथं ज्योतिरुपक्रमात्वमित्य- त्राह-- ज्योतिरुपक्रमा, रक्त श्वेत कृष्ण वर्णा इस प्रकृति का अजा होना कैसे संभव है ? यदि अजा है तो वह ज्योतिरुपक्रमा कैसे है ? इस शंका की निवृत्ति करते हैं-- कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिषदविरोधः ॥१।४।१०॥ प्रसक्ताशंकानिवृत्यर्थश्च शब्दः । अस्याः प्रकृतेरजात्वं ज्योति- रुपक्रमात्वं च न विरुध्यते, कुतः ? कल्पनोपदेशात् । कल्पनं क्लृप्तिः सृष्टिः जगद् सृष्ट्युपदेशादित्यर्थः । यथा-“सूर्याश्चंद्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्” इति कल्पनं सृष्टिः । अत्रापि “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्” इति जगत् सृष्टिरुपदिश्यते । स्वेनाविभक्ताद- स्मात् सूक्ष्मावस्थात् कारणान्मायी सर्वेश्वरः सर्वं जगत् सृजती- त्यर्थः । अनेन कल्पनोपदेशेनास्याः प्रकृतेः कार्यकारणरूपेणावस्था- द्वयान्वयोऽवगम्यते । सा हि प्रलयवेलायां ब्रह्मतापन्ना अविभक्त नामरूपा सूक्ष्मरूपेणावतिष्ठते । सृष्टि वेलायां तद्भूत सत्वादिगुणाः विभक्त नामरूपाऽव्यक्तादि शब्दवाच्या तेजोऽबन्नादिरूपेण च परिणता लोहित शुक्ल कृष्णाकारा चावतिष्ठते । अतः कारणावस्था अजा कार्यावस्थाज्योतिरूपक्रमेति न विरोधः । सूत्रस्थ च शब्द की गई शंका की निवृत्ति के लिए प्रयोग किया गया है । इस प्रकृति के अजात्व और ज्योतिरुपक्रमात्व में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि-कल्पना का उपदेश दिया गया है । क्लृप्ति का अर्थ