भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५७३ ) होता है सृष्टि, इसलिए कल्पना के उपदेश का तात्पर्य है सृष्टि का उपदेश । जैसे कि--"विधाता ने वैसे ही सूर्य और चंद्र की कल्पना की" इस वाक्य में कल्पना शब्द सृष्टि वाची है । इसमें भी "यह मायावी भूत समुदाय से जगत की सृष्टि करता है" ऐसा जगत सृष्टि का उपदेश दिया गया है । उक्त वाक्य का तात्पर्य है कि-मायाधीश सर्वेश्वर, अपने से अभिन्न, सूक्ष्म कारण रूप में स्थित इस प्रकृति से ही जगत को रचते हैं। इस कल्पनोपदेश से इस प्रकृति की कार्यकारण रूप दोनों अवस्थाओं की प्रतीति होती है। यह प्रकृति प्रलयावस्था में, अविभक्त नाम रूप वाली होकर सूक्ष्म रूप से ब्रह्म में लीन होकर स्थित रहती है । सृष्टि काल में यही, सत्त्व आदि गुणों के रूप में प्रकट विभक्त नाम रूपवाली, अव्यक्त आदि नामों वाली, तेज जल पृथिवी आदि रूपों में परिणत, रक्त शुक्ल कृष्ण आकार वाली हो जाती है । इस प्रकार कारण अवस्था वाली अजा और ज्योतिरुपक्रमा अजा में कोई विरोध प्रतीत नहीं होता । मध्वादिवत्-यथेश्वरेणादित्यस्य कारणावस्थायामेकस्यैवाव- स्थितस्य कार्यावस्थायामृग्यजुःसामाथर्व प्रतिपाद्य कर्मनिष्पाद्यरसा- श्रयतया वस्वादि देवताभोग्यत्वाय मधृत्वकल्पनं उदयास्तमय कल्प- नं च न विरुध्यते, तदुक्तं मधुविद्यायाम्-"असौ वा आदित्यो देवमधु" इत्यारभ्य "अथ तत ऊर्ध्वं उदेत्य नैवोदेतानास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता" इत्यंतेन । एकलः एकस्वभावः । अतोऽनेन मंत्रेण ब्रह्मा- त्मिकाऽजैवाभिधीयते, न कपिलतंत्र सिद्धेति सिद्धम् । जैसे कि--कारणावस्था में स्थित एक ही आदित्य की कार्यावस्था अर्थात् उदीयमान अवस्था की ऋग् यजु साम और अथर्व वेद में, कर्म- फलावाप्ति के लिए, वसु आदि देवताओं की भोग्यता संपादन के लिए मधुरूप से की गई कल्पना में कोई विरुद्धता नहीं है, वैसे ही अजा के भी कार्यकारण रूप में कोई विरुद्धता नहीं है, मधुविद्या के-"यह आदित्य ही देवताओं का मधु है" इत्यादि से प्रारंभ कर "जैसा अब उदय हुआ है, वैसा अब उदय न होगा" इस अंतिम वाक्य तक के वर्णन से यही ankurnagpal108@gmail.com