श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५७४ ) बात स्पष्ट होती है। मंत्र में प्रयुक्त एकल शब्द एक स्वभाव का वाची है। इस मंत्र से ब्रह्मात्मिका अजा की ही प्रतीति होती है, कापिल तंत्र- सिद्ध प्रकृति की नहीं यह निश्चित मत है। अन्ये त्वस्मिन् मन्त्रे तेजोबन्नलक्षणाऽजैकाभिधीयत इति ब्रुवते । ते प्रष्टव्याः, किं तेजोवन्नान्येव तेजोबन्नात्मिकाऽजेका, उत तेजोबन्न रूपं ब्रह्मैव, किं वा तेजोबन्नकारणभूता काचित्—इति । प्रथमे कल्पे तेजोबन्नानां अनेकत्वात् “अजामेकाम्” इति विरुध्यते । न च वाच्यं तेजोबन्नानामनेकत्वेऽपि त्रिवृत्करणे नैकतापत्तिरिति त्रिवृत्करणेऽपि बहुत्वानपगमात्--“इमास्तिस्रो देवताः” तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि' इति प्रत्येकं त्रिवित्करणोपदेशात् । द्वितीयः कल्पो विकल्प्यः, किं तेजोबन्नरूपेण विकृतं ब्रह्मैवाजैका, किं वा स्वरूपेणावस्थितमविकृतमिति । प्रथमः कल्पो बहुत्वानपायादेव निरस्तः । द्वितीयोऽपि “लोहितशुक्लकृष्णां” इति विरुध्यते । स्वरूपेणावस्थितं ब्रह्म तेजोबन्नलक्षणमिति वक्तुमपि शक्येत । तृतीये कल्पेऽप्यजाशब्देन तेजोबन्नानि निर्दिश्य तैस्तत्कारणावस्थोपस्थापनी- येत्यास्थेयम् । ततो वरमजाशब्देन तेजोबन्नकारणावस्थायाः श्रुति- सिद्धाया एवाभिधानम् । अन्य संप्रदाय वाले कहते हैं कि—इस मंत्र में तेज जल पृथिवी रूपा एक अजा का वर्णन है। ऐसा कहने वालों से प्रश्न है कि–तेज जल पृथिवी रूप ही तेज जल पृथिव्यात्मिका एक अजा है ? अथवा तेज जल पृथिवी रूप ब्रह्म ही अजा है ? अथवा तेज जल पृथिवी की कारण भूता कोई शक्ति विशेष है ? प्रथम प्रकार तो संभव नहीं है क्योंकि तेज जल पृथिवी आदि तो अनेक हैं और अजा एक है, यह विरुद्धता कैसे संभव होगी । आप यह नहीं कह सकते कि--तेज जल पृथिवी अनेक होते हुए भी त्रिवृत् प्रक्रिया से एक ही माने जाते हैं। उनके व्यात्मक होते हुए भी उनकी अनेकता भंग नहीं होती, जैसा कि--“इन तीन देवताओं को एक-एक के तीन-तीन करूँगा” इत्यादि से ज्ञात होता है। ankurnagpal108@gmail.com