श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५७५ ) द्वितीय प्रकार भी वैकल्पिक है, अर्थात् यह अजा, तेज जल पृथवी रूप से विकृत ब्रह्म है, अथवा स्वरूपावस्थ अविकृत ब्रह्म है ? उसका विकृत रूप तो हो नहीं सकता, क्योंकि विकृत रूप अनेक होता है, और अजा एक है । अविकृत रूप भी "लोहित शुक्ल कृष्णा" इस विकृत वर्णन से विरुद्ध है । इसलिए तेज जल पृथ्वी आदि रूप वाली स्वरूपावस्थिति है ऐसा तो कह नहीं सकते । तृतीय प्रकार में भी, अजा शब्द से तेज जल पृथिवी आदि निर्दिष्ट उसकी कारणावस्था ही माननी पड़ेगी । यदि ऐसा ही मानना है तो, श्रुतिसिद्ध कारणावस्था के निर्देश को मानना ही श्रेष्ठ है । यत्पुनरस्याः प्रकृतेरजाशब्देन छागत्वपरिकल्पनमुपदिश्यत इति, तदप्यसंगतम्, निष्प्रयोजनत्वात् । यथा-“आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादिषु ब्रह्मप्राप्त्युपायताख्यापनाय शरीरादिषु रथादिरूपणं क्रियते तद्वदस्यां प्रकृतौ छागत्वपरिकल्पनं क्वोपयुज्यते ? न केवल- मुपयोगाभाव एव, विरोधश्च, कृत्स्न जगत् कारणभूतायाः स्वस्मि- न्नादिकाल संबद्धानां सर्वेषामेव चेतनानां निखिल सुखदुःखोपभोगा- पवर्ग साधनभूतायाः अचेतनायाः अत्यल्प प्रजासर्गकरागंतुक संगम- चेतन विशेषैकरूपा अत्यल्प प्रयोजन साधन स्वपरित्यागाहेतुभूत स्वसंबंधिपरित्याग समर्थ चेतन विशेषरूपच्छागस्वभावख्यापनाय तद्रूपत्वकल्पनं विरुद्धमेव । “अजामेकां” अजो ह्येकः “अजोऽन्यः” इत्यत्राजाशब्दस्य विरूपार्थकल्पनं च न शोभनम् । सर्वत्र छागत्वं परिकल्प्यत इतिचेत् “जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः” इति विदुष आत्यंतिक प्रकृति परित्यागं कुर्वंतो अनेन वान्येन वा पुनरपि संबंध- योग्छागत्वपरिकल्पनमत्यंत विरुद्धम् । यदि यह कहें कि--अजा शब्द का अर्थ बकरी है, ऐसा कहना भी असंगत है, ऐसे अर्थ में अजा शब्द के प्रयोग का कोई प्रयोजन समझ में नहीं आता । जैसे कि-“आत्मा को सारथी जानो” इत्यादि वाक्य में, ankurnagpal108@gmail.com