श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्म प्राप्ति की उपायता दिखलाने के लिए, शरीरादि की रथादि रूपों में कल्पना की गई, वैसे ही इस अजा का बकरी अर्थ करने में क्या उपयोग है ? अजा शब्द का बकरी अर्थ करने में केवल प्रयोजन का ही अभाव नहीं है अपितु विरोध भी पड़ता है । संपूर्ण जगत की कारण रूपा प्रकृति, अचेतन होती हुई भी, अनादिकाल से अपने में संबद्ध विशिष्ट चेतनों के समस्त सुख दुःखों के भोग की तथा अपवर्ग की राधिका भी है । उसको अत्यल्प संतान समुत्पादनार्थ, चेतन विशेष के साथ अभिनव संगम संबंध से केवल दुग्ध प्रदान रूप प्रयोजन के लिए बकरी रूप से कल्पित करना, उसके स्वरूप के विरुद्ध ही होगा । “अजामेकाम्, अजो ह्ये कः, अजोऽन्यः” इन पदों में प्रयुक्त अजा शब्द जो कि क्रमशः प्रकृति, बद्धजीव और मुक्त जीव के लिए कहा गया है, यहाँ बकरी अर्थ करना अशोभनीय भी है । यदि कहो कि हम तीनों ही अर्थों में बकरी अर्थ करेंगे तो “दूसरा अज इस भुक्तभोगी अजा का त्याग करता है” इस वाक्य में संपूर्ण रूप से प्रकृति को त्याग करने वाले जिस ज्ञानी पुरुष अज का वर्णन किया गया है, उसकी बकरी रूप से कल्पना करना तो उस मुक्त पुरुष को पुनः माया संबंधी बकरी रूप से बांधना है, जो कि अत्यंत विरुद्ध है । ३ संख्योपसंग्रहाधिकरण :— न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ।१।४।११॥ वाजसनेयिनः समामनंति-“यस्मिन् पंच पंचजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः, तमेवम्मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम्” इति । किमयं मंत्रः कपिलतंत्रसिद्ध तत्वप्रतिपादनपरः उत नेति संदि- ह्यते । किं युक्तम् ? तंत्रसिद्धतत्व प्रतिपादनपर इति, कुतः ? पंच- शब्द विशेषात् पंचजनशब्दात् पंचविंशति तत्त्व प्रतीतेः । एतदुक्तं भवति-“पंचजनाः” इति समासः समाहार विषयः । पंचानां जनानां समूहः पंचजनाः “पंचपूल्य” इतिवत् । पंचजना इति लिंगव्यत्य- यश्छांदसः, ते च समूहाः कतीत्यपेक्षायां पंचजनशब्द विशेषेण ankurnagpal108@gmail.com