श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 650, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५८८ )
वस्तु जगत्कारणं वेद्यतया न तेभ्यः प्रतीयते । तथाहि-भोक्तारमेव पुरुषं कारणं वेद्यतयाऽधीयते कौषीतकिनो बालाक्यजातशत्रु- संवादे--"ब्रह्म ते ब्रवाणि" इत्युपक्रम्य "यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः" इति उपक्रमे वक्तव्यतया बालाकिनोपक्षिप्तं ब्रह्माजानते तस्मा एव अजात- शत्रुणा "स वै वेदितव्यः" इति ब्रह्मोपदिश्यते । "यस्य वैतत्कर्म" इति कर्मसंबंधात् प्रकृत्यध्यक्षो भोक्ता पुरुषो वेदितव्योपदिश्टं ब्रह्मेति निश्चीयते । नाथनिरम् , तस्य कर्मसंबंधानभ्युपगमात् । कर्म च पुण्यापुण्यलक्षणं क्षेत्रज्ञस्यैव संभवति । सांख्यवादी पुनः प्रतिपक्षी होकर उठते है--यद्यपि वेदान्त वाक्यो मे चेतन को ही जगत् कारण रूप से प्रतिपादित किया गया है, तथापि उनमे सांख्य तंत्र सिद्ध प्रधान पुरुष के अतिरिक्त, कोई अन्य वस्तु जगत् कारणरूप से नही प्रतीत होती । कौषीतकि शाखा के बालाकि और अजातशत्रु के कथोपकथन मे, भोक्ता को ही, कारण रूप से, ज्ञातव्य बतलाया गया है । "तुझे ब्रह्मोपदेश करता हूँ" इत्यादि से प्रारंभ करके "हे बालाकि ! जो इस पुरुष समुदाय का कर्त्ता है, एवं जगत् जिसका कार्य है, वही ज्ञातव्य तत्त्व है" । बालाकि ने उपक्रम मे जिस ब्रह्म को जानने की अभिलाषा प्रकट की, बालाकि उस ब्रह्म को नही जानता ऐसा समझकर अजातशत्रु ने स्वतः ही उसे ब्रह्म सबंधी उपदेश उक्त वाक्य में दिया । "यही जिसका कर्म है" इत्यादि वाक्य मे, कर्म के साथ संबंधित होने से यह निश्चित होता है कि-ज्ञातव्यरूप से उपदिष्ट ब्रह्म तत्त्व, सांख्य सम्मत प्रकृति प्रेरक, भोक्ता पुरुष से भिन्न, कोई दूसरा नही है ऐसा प्रतीत होता है । उक्त प्रसग मे जिस ब्रह्म का उल्लेख किया गया है, वह परब्रह्म नही हो सकता, क्योकि--परब्रह्म का कही भी, कर्म के साथ संबंध नही बतलाया गया है । पुण्य पाप लक्षण वाले कर्म का संबंध तो क्षेत्रज्ञ ( जीव ) से ही हो सकता है । न च वाच्यम्-क्रियत इति कर्मेति व्युत्पत्त्या प्रत्यक्षादि प्रमाणो- पस्थापितं जगदेतत्कर्मेति निर्दिश्यते, यस्यैतत्कृत्स्नं जगत् कर्म, स