भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५८६ ) वेदिव्य इति क्षेत्रज्ञादर्थान्तरमेव प्रतीयतेति । “यो वै बालाके एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता यस्य वैतत्कर्म” इति पृथङ्निर्देश वैयर्थ्यात् , कर्मशब्दस्य च लोकवेदयोः पुण्य पाप रूप एव कर्मणि प्रसिद्धेः । तत्तद्भोक्तृकर्मनिमित्तत्वात् जगदुत्पत्तेरेतेषां पुरुषाणां कर्त्तेति च भोक्तुरेवोपपद्यते । तदयमर्थः –एतेषां आदित्यमंडलाद्यधिकरणानां क्षेत्रज्ञभोग्य भोगोपकरणभूतानां पुरुषाणां यः कारणभूतः, एतत्- कारणभावहेतुभूतं पुण्यापुण्यलक्षणं च कर्म यस्य स वेदितव्यः, तत्स्व- रूपं प्रकृतेर्विविक्तं वेदितव्यम्–इति । ऐसा नहीं कह सकते कि--जो किया जाय उसे कर्म कहते हैं, इस व्याख्या के अनुसार, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध जगत् ही, इस ब्रह्म के कर्म के रूप में बतलाया गया है । “जिसका यह सारा जगत् कर्म है, वही ज्ञातव्य है” इत्यादि में क्षेत्रज्ञ से विलक्षण, परब्रह्म ही प्रतीत होता है । ऐसा मानने पर तो “हे बालाकि ! जो इन पुरुषों का कर्त्ता है, एवं यह जगत् जिसका कर्म है” इत्यादि में किया गया कर्त्ता और कर्म का पृथक् निर्देश ही व्यर्थ हो जायेगा । कर्म शब्द की, लोक और वेद में पाप और पुण्य रूप कर्म से ही प्रसिद्धि है । विभिन्न भोक्ताओं के कर्मा- नुसार ही जगत् की उत्पत्ति होती है, इस नियम के अनुसार “इन सब पुरुषों का कर्त्ता” इत्यादि वक्तव्य से, भोक्ता संबंधी कर्म ही, सिद्ध होता है । उक्त प्रसंग से यह तात्पर्य निकलता है कि, जो आदित्य मंडल आदि में स्थित हैं, एवं जीव के भोग्य और भोगोपकरण रूप इन पुरुषों के कारण हैं तथा कारण भाव के हेतुभूत, पाप और पुण्य कर्म वाले हैं, उन्हें ही जानना चाहिए, अर्थात् उनके स्वरूप को, प्रकृति से भिन्न रूप से जानना चाहिए । तथोत्तरत्र– “तौ ह सुप्तं पुरुषमाजग्मतुः तं यष्टिना चिक्षेप” इति सुप्तपुरुषागमनयष्टिघातोत्थापनादीनि च भोक्तृप्रतिपादन एव लिंगानि । तथोपरिष्टादपि भोक्तैव प्रतिपाद्यते“ तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुंको यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुंजंत्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुंके ankurnagpal108@gmail.com