भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३६५ ) तत्कर्म" इति निर्दिष्टं न पुरुषमात्रम् अपितु निखिलजगदेककारणम् ब्रह्मैवेत्युक्तम् । जो यह कहते हो कि—इस प्रसंग में जीव शब्द और मुख्य प्राण बोधक शब्द के प्रयोग से ज्ञात होता है कि—भोक्ता पुरुष का ही इस प्रकरण में प्रतिपादन किया गया है, परमात्मा का नहीं । इस विषय की व्याख्या हम कर चुके हैं, इसका समाधान भी प्रतर्दन विद्या के प्रसंग में कर चुके हैं। अब तो कथन यह है कि—जब प्रकरण के उपक्रम और उपसंहार की पर्यालोचना से यह निश्चित हो चुका कि सारा प्रसंग परब्रह्म परक ही है, इसलिये प्रयुक्त जितने भी शब्द हैं, उनका तदनुसार ही अर्थ करना चाहिए यही बात वहाँ प्रतिपादित भी है। इस प्रसंग के उपक्रम में भी जैसे—"तुझे ब्रह्मोपदेश देता हूँ" ब्रह्म का उल्लेख किया गया है। प्रसंग के मध्य के—"यह जिसका कर्म है" इस निर्देश में केवल पुरुष मात्र ही नहीं अपितु संपूर्ण जगत के कारण रूप से ब्रह्म का ही निर्देश किया गया है । उपसंहारे च— "सर्वान्पाप्मनोऽपहृत्य सर्वेषां च भूतानां श्रैष्ठ्- यं स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येति य एवं वेद" इति ब्रह्मोपासनैकान्तं सर्वपापापहतिपूर्वकं स्वाराज्यं च फलं श्रुतम्, अतोऽस्यवाक्यस्य परब्रह्मपरत्वनिश्चयेन जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्यपि तत्परतया वर्णनी- यानि—इति । प्रातर्दने हि उपासात्रैविध्येन जीवमुख्यप्राणलिंगानां ब्रह्मपरत्वमुक्तम्, अत्रापि–"अथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति" इति सामानाधिकरण्य संभवे वैयधिकरण्यसमाश्रयणाऽऽयोगात् ब्रह्मण्येव प्राणशब्द प्रयोग निश्चयेन च प्राणशरीर कब्रह्मोपासनार्थं प्राणसंकी- र्त्तनं लिंगं युज्यते । उपसंहार में भी—"जो इस प्रकार जानता है वह समस्त पापों को भस्म करके, संपूर्ण भूतों के श्रेष्ठतम रूप स्वर्ग राज्य का आधिपत्य ankurnagpal108@gmail.com