भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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“य एतेषां कर्त्ता यस्य वैतत्कर्म” इति पृथङ्निर्देशस्य चायम- भिप्रायः, ये त्वया ब्रह्मत्वेन निर्दिष्टाः तेषां यः कर्त्ता,ते यत्कार्यभूताः, किं विशिष्याभिधीयते, कृत्स्नस्यजगत्यस्यकार्यम्, उत्कृष्टा अपकृ- ष्टाः चेतनाम्चेतनाश्च सर्वेपदार्था यत्कार्यत्वे तुल्याः, स परमका- रणभूतः पुरुषोत्तमो वेदितव्यः, इति। जगदुत्पत्तेर्जीवकर्मनिबंधनत्वेऽपि न जीवः स्वभोग्यभोगोपकरणादेः स्वयमुत्पादक., अपितु स्वकर्मानुगु- ण्येनेश्वरसृष्टं सर्वं भुंक्ते, अतो न तस्य पुरुषान् प्रति कर्तृत्वमुपप- द्यते। अतः सर्वं वेदांतेषु परमकारणतया प्रसिद्धं परंब्रह्मैवात्र वेदि- तव्यतयोपदिश्यते। “जो इसका कर्त्ता है, एवं यह जिसका कर्म है” इत्यादि में किये गए कर्त्ता कर्म के पृथक् निर्देश का अभिप्राय है कि—तुम्हारे द्वारा जो ब्रह्मत्वरूप से निर्दिष्ट पुरुष हैं तथा जो कर्त्ता है, जिसके वे सब कार्यरूप हैं, अधिक क्या, सारा जगत ही जिसका कार्य है, भला बुरा, जड चेतन सभी पदार्थ उसके कार्य के समान हैं, वह परमकारण रूप पुरुषोत्तम ही ज्ञातव्य हैं। जीव का पापपुण्यमय कर्म ही यदि जगत की उत्पत्ति का कारण है तो प्रश्न उठता है कि—जीव अपने भोग्य और भोगोपकरणों का उत्पादक कैसे होगा ? वह तो अपने कर्मों के अनुसार, ईश्वर सृष्ट पदार्थों का भोग मात्र कर सकता है, जीव का जीवों के प्रति कर्तृत्व कभी संभव नहीं है। सभी वेदांत वाक्यो मे परम कारण रूप से प्रसिद्ध परब्रह्म ही उक्त प्रकरण के ज्ञातव्य विषय हैं। जीवमुख्यप्राणलिंगान्नेति चेत्तद् व्याख्यातम् ।१।४।१७।। अथ यदुक्तम्-जीवल्गिान्मुख्यप्राणसकीर्त्तनाच्च लिंगाद् भोक्तैवाऽस्मिन्प्रकरणे प्रतिपाद्यते, न परमात्मा इति, तद्व्याख्या- तम्। तस्य निर्वाहः प्रतर्दनविद्यायामभिहितः। एदतुक्तं भवति-यत्रो- पक्रमोपसंहारपर्यालोचनया ब्रह्मपरं वाक्यमिति निश्चितम्, तत्रा- न्यलिंगानि तदनुरोधेन वर्णनीयानीति तत्र प्रतिपादितम्। अत्राप्युक्रमे “ब्रह्म ते ब्रवाणि” इति ब्रह्मोपक्षिसम्, मध्ये च “यस्य वै ankurnagpal108@gmail.com