भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १६३ ) जातीयाश्चपुरुषास्तेनैव विदिता इति तदविदितपुरुषविशेषज्ञापन- परोऽयं कर्मशब्दो न पुण्यापुण्यमात्रवाची, अपितु कृत्स्नस्यजगतः कार्यत्ववाची । एवमेवखल्वविदितोऽर्थउपदिष्टो भवति । पुरुषस्य कर्मसंबंधोपलक्षितस्वाभाविकस्वरूपस्याज्ञातस्य वेदितव्योपदेशे च लक्षणा, कर्मसंबंधमात्रस्यैव वेदितव्यस्वरूपलक्षणत्वात् यस्य कर्म स वेदितव्य, इत्येतावत्तैव तत्सिद्धेः “यस्य वैतत्कर्म” इत्येतच्छब्द वैयर्थ्यं च । “एतत्” शब्द का अर्थ, प्रकरण आदि से बहुत ही स्पष्ट और सामान्य ढंग से, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से गृहीत, चेतन अचेतन युक्त समस्त जगत का वाची प्रतीत होता है । इस प्रसंग में प्रयुक्त कर्म शब्द, पुण्यपाप रूप ही कर्म नहीं है । “तुम्हें ब्रह्म तत्त्व बतलाता हूँ’ इत्यादि से बालाकि को आदित्यमण्डल से अधिष्ठित जिस पूर्ण पुरुष ब्रह्म का निर्देश किया गया, उसी को “मुझे झूठी बातों से मत ठगो” ऐसी अब्रह्म- वादी बालाकि द्वारा निन्दा करने पर, उसके अज्ञान निवारण के लिए अजातशत्रु ने “यो वै बालाके” इत्यादि वाक्य से अविज्ञात ब्रह्म तत्त्व का निरूपण किया । पुण्यपाप संबद्ध आदित्य आदि के आश्रयभूत एवं उसके समानजातीय पुरुष को तो बालाकि स्वयं ही जानता था, उसको वैसा ही उपदेश देने का कोई मतलब ही नहीं था, इससे निश्चित होता है कि-“कर्म” शब्द एकमात्र पुण्यापुण्य का ही वाचक नहीं है, अपितु संपूर्ण जगत की कार्यता का भी बोधक है । ऐसा मानने से ही, सही अर्थों में अविज्ञात तत्त्व का उपदेश घटित होता है । जो स्वतः सिद्ध स्वरूप है, समय विशेष में ही कर्म से संबद्ध होता है, उस अविज्ञात पुरुष की यदि ज्ञातव्योपदेश रूप से कल्पना की जाय तो, वह लक्षणा द्वारा ही संभव है, क्योंकि-कर्म के साथ जो संबंध है, एकमात्र उससे ही जिसके स्वरूप का ज्ञान होता है, वहां ज्ञातव्य तत्त्व है । “यह जगत जिसका कर्म है, उसे जानो” इतना कहने मात्र से ही उद्देश्य की सिद्धि हो जाती है । यदि जगत् रूप कर्म का संबंध ज्ञेय से तोड़ दिया जाय तो वाक्यगत “एतत्” शब्द की उपयोगिता ही समाप्त हो जायगी । ankurnagpal108@gmail.com