श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५६२ ) ब्रह्म का उपक्रम किया गया है, वह निश्चित पुरुष ही है, इसके अतिरिक्त उक्त प्रकरण में ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। कारणगत ईक्षण आदि चेतन धर्म भी इस पुरुष ( जीव ) में ही घटते हैं। इस चेतन पुरुष द्वारा परिचालित प्रकृति ही जगत का कारण है, यह भी निश्चित होता है। इति प्राप्ते प्रचक्ष्महे—जगद्वाचित्वात्,अत्र पुण्यापुण्य परवशः क्षेत्रज्ञः स्वस्मिन् प्रकृतिधर्माध्यासेन तत्परिणामहेतुभूतः पुरुषो नाभिधीयते, अपितु निरस्तसमस्ताविद्यादिदोषगन्धोऽनवधिकातिश- यासंख्येयकल्याणगुणनिधिर्निखिल जगदेककारणभूतः पुरुषोत्तमोऽ- भिधीयते । कुतः ? “यस्य वैतत्कर्म” इति, अत्रैतच्छब्दान्वितस्य कर्मशब्दस्य परमपुरुषकार्यभूतजगद्वाचित्वात् । उक्त मत पर सिद्धान्त रूप से “जगद्वाचित्वात्” सूत्र प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रकरण में, पुण्यपाप परवश क्षुद्र क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) जो कि स्वतः कर्तृत्व आदि प्राकृतिक धर्मों को कार्यरूप में परिणत करने में असमर्थ है, वह पुरुष अभिधेय नहीं है। अपितु अविद्या आदि दोषों से रहित, अगणित अपार असंख्य कल्याणगुण सागर, समस्त जगत का एक- मात्र कारणभूत पुरुषोत्तम ही अभिधेय है। “यह जगत् जिसका कर्म है” इत्यादि वाक्य में “एतत्” शब्द से प्रयुक्त “कर्म” शब्द, परम पुरुष पर- मेश्वर के कार्यरूप जगत का ही वाचक है। एतच्छब्दो ह्यर्थप्रकरणादिभिरसंकुचितवृत्तिरविशेषेण प्रत्यक्षा- दिप्रमाणोपस्थापितनिखिलचिदचिन्मिश्रितजगद्विषयः । न च पुण्या- पुण्यलक्षणं कर्मात्र कर्मशब्दाभिधेयम् “ब्रह्म ते ब्रवाणि” इत्युपक्रम्य ब्रह्मत्वेन बालाकिना निर्दिष्टादित्यमण्डलाद्यधिकरणानां पुरुषा- णामब्रह्मत्वेन “मृषा वै खलु मा संवादिष्ठाः” इतितमब्रह्मवादिनमपोद्य तेनाविदितब्रह्मज्ञानायाजातशत्रुणेदं वाक्यमवतारितं “यो वै बालाके” इत्यादि। पुण्यापुण्यलक्षण कर्मसंबंधित आदित्याद्यधिकरणाः तत्स- ankurnagpal108@gmail.com