श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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है। मन भी समस्त चिन्तनों के साथ उसके पास उपस्थित रहता है। जब यह जागता है तब, अग्नि से प्रस्फुटित चिनगारियों की तरह, इन्द्रियाँ इससे अलग होकर यथा स्थान पहुँच जाती हैं, उन इन्द्रियों से उनके अधिष्ठातृ देवता तथा उन देवताओं से समस्त लोक अर्थात् शब्दादि विषय अलग हो जाते हैं" इत्यादि में स्वप्न, सुषुप्ति और जागृति अव- स्थाओं मे वर्त्तमान, वाग आदि इन्द्रियों का विलय और उद्भवस्थान जीवात्मा ही बतलाया गया है।
अस्मिन् जीवात्मनि प्राणभृत्त्वनिबंधनोऽयं प्राणशब्दः-"स यदा प्रतिबुध्यते" इति प्राणशब्दनिर्दिष्टस्य प्रबोधश्रवणात् मुख्यप्राणस्ये- श्वरस्य च सुषुप्तिप्रबोधयोऽसंभवात् , अथवा "अस्मिन् प्राणे" इति व्यधिकरणे सप्तम्यौ अस्मिन्नात्मनि वर्त्तमाने प्राण एवैकधा भवति वागादिकरणग्राम इति। प्राणशब्दस्य मुख्य प्राण परत्वेऽपि जीव एवा- स्मिन् प्रकरणे प्रतिपाद्यते, स्वतः प्राणस्य जीवोपकरणत्वात्। अतो वक्तव्यतयोपक्रान्तं ब्रह्म पुरुष एवेति, तद्व्यतिरिक्तेश्वरासिद्धेः। कारणगताश्चेक्षणादयश्चेतनधर्माः अस्मिन्नेवोपपद्यंत, इत्येतदधि- ष्ठितं प्रधानमेव जगत्कारणम्।
यह जीवात्मा प्राणभृत अर्थात् प्राण विधारक है, इसीलिए उसमें प्राण शब्द का प्रयोग किया गया है। "वह जिस समय उठता है" इस स्थल में, प्राणशब्दनिर्दिष्ट पदार्थ का ही प्रबोध या जागरण प्रतीत होता है। मुख्य प्राण अर्थात् प्राणों के ईश्वर का प्रबोध या जागरण कभी संभव नहीं है। अथवा "अस्मिन् प्राणे" इस स्थल में जो दो सप्तमी विभक्ति का प्रयोग किया गया है, वह व्यधिकरण (अर्थात् दोनों में विशेष्य विशेषण भाव नहीं है) का प्रतिपादन करता है, जिससे निश्चित होता है कि--इस वर्त्तमान प्राण में ही वागादि इन्द्रियाँ एकत्र हो जाती हैं। प्राण शब्द के मुख्य प्राण परक होते हुए भी, उक्त प्रकरण में, जीव अर्थ में ही उसका प्रयोग किया गया है, प्राण तो स्वतः ही जीव का उप- करण (भोग का साधन) है। प्रकरण के प्रारंभ में वक्तव्य रूप से जिस