भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५६६ ) आश्रयभूत परमात्मा का ऐसा वर्णन मिलता है कि-“यह जो विज्ञानमय पुरुष है, वह उस समय ( सुप्तावस्था में ) कहाँ था ? और बाद में ( जागरितावस्था में ) कहाँ से आ गया ? यह जब सुप्त था तब यह विज्ञानमय पुरुष, प्राण समूह विज्ञान के साथ, स्वीय विज्ञान को ग्रहण करके, इस हृदयस्थ आकाश में शयन कर रहा था” "दहरोऽस्मिन्नंतर आकाश"इत्यादि में आकाश शब्द परमात्मा के लिए प्रसिद्ध है। इस विवेचन से निश्चित होता है कि-उक्त प्रसंग में जो जीव का उल्लेख किया गया है, वह ब्रह्म परक ही है तथा पुरुष से भिन्न संपूर्ण जगत का कारण परब्रह्म ही ज्ञातव्य है। सांख्यतंत्रसिद्ध पुरुष और उससे अविष्ठित प्रधान का कारणरूप से वेदांत वाक्यों में कहीं भी उल्लेख नहीं है। ६ वाक्यान्वयाधिकरण :- वाक्यान्वयात् ।१।४।१९॥ अत्रापि कापिलतंत्रसिद्धपुरुषतत्त्वावेदनपरंवाक्यं क्वचित् दृश्यत इति, तदतिरिक्त ईश्वरो नाम न कश्चित् संभवतीत्याशंक्य निराकरोति । इस प्रकरण में भी कापिलतंत्र सिद्ध पुरुष तत्त्व को बतलाने वाले वाक्य कहीं-कहीं दिखलाई देते हैं, इसलिए उसके अतिरिक्त ईश्वर नामक कोई दूसरा नहीं हो सकता, ऐसी शंका करके उसका निराकरण करते हैं। बृहदारण्यके मैत्रेयी ब्राह्मणे श्रूयते-“न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति" इत्यारभ्य “न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति, आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यः मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम् इति । बृहदारण्यकोपनिषद् के मैत्रेयी ब्राह्मण में कहा गया है कि- “अरे पति की कामना से पति प्रिय नहीं होता" इत्यादि से लेकर “अरे सब की कामना से सब प्रिय नहीं होते, आत्मा को ही देखो, सुनो, मनन करो और अभ्यास करो, अरी मैत्रेयी ! इस आत्मा में ही देखने, सुनने, मनन करने और जानने से यह सारा जागतिक प्रसार ज्ञात हो जाता है।" यहाँ तक । ankurnagpal108@gmail.com