श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६०० ) तत्र संशयः, किमस्मिन्वाक्ये द्रष्टव्यतयोपदिश्यमानः तंत्रसिद्धः पुरुष एव, अथवा सर्वज्ञः सत्यसंकल्पः सर्वेश्वरः ? इति किं युक्तम् ? पुरुष इति, कुतः ? आदिमध्यावसानेषु पुरुषस्यैव प्रतीतेः, उपक्रमे तावत् पतिजायापुत्रवित्तपश्वादिप्रियत्वयोगाज्जीवात्मैव प्रतीयते । मध्येऽपि “विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्ति" इत्युत्पत्तिविनाशयोगात्स एवावगम्यते । तथाऽन्ते च “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" इति स एव ज्ञाता क्षेत्रज्ञ इति प्रतीयते, नेश्वरः । अतस्तंत्रसिद्धपुरुष प्रतिपादनपरमिदं वाक्यमिति निश्चीयते । उक्त वाक्य के विषय में संशय होता है कि-इसमें द्रष्टव्य रूप से उपदिष्ट, तंत्रसिद्ध पुरुष ही है, अथवा सर्वज्ञ सत्यसंकल्प सर्वेश्वर हैं ? कह सकते हैं कि पुरुष ही है; वाक्य के आदि मध्य और अन्त से पुरुष की ही प्रतीति होती है । उपक्रम में पति स्त्री पुत्र वित्त पशु आदि की प्रियता का संपर्क दिखलाया गया है जिससे जीवात्मा की ही प्रतीति होती है । मध्य में भी जैसे-“विज्ञानघन ही इन पंच भूतों का अनुगत होकर व्यक्त होता है तथा उनके विनष्ट होने पर विनष्ट हो जाता है, मृत्यु के बाद कोई चिन्ह अवशिष्ट नहीं रह जाता"-उत्पत्ति और विनाश के साथ जो संयोग दिखलाया गया है, उससे भी उसी (जीव) का बोध होता है । इसी प्रकार अन्त में भी-“अरे ! विज्ञाता को और कैसे जानेगी ?” वह क्षेत्रज्ञ ही ज्ञाता होता है, ईश्वर नहीं । इससे निश्चित होता है कि-यह वाक्य सांख्य तंत्रोक्त पुरुष परक ही है । ननु “अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन” इत्युपक्रमामृतत्व- प्राप्त्युपायोपदेशपरमिदं वाक्यमिदमवगम्यते । तत्कथं पुरुषप्रतिपादन परत्वमस्यवाक्यस्य तदुच्यते, अतएव ह्यत्र पुरुषप्रतिपादनम् । तंत्रे हि अचिद्धर्माध्यासविमुक्तपुरुषस्वरूपरूपायाथात्म्यविज्ञानमेवा- मृतत्वहेतुत्वेनोच्यते, अतो जीवात्मनः प्रकृतिवियुक्तं स्वरूपमिहामृत- त्वाय “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः” इत्यादिनापदिश्यते । ankurnagpal108@gmail.com