भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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( ६०२ ) से भेद निषेध करते हुए दिखलाया गया है कि-एक स्वरूप आत्मा में, प्रकृति के परिणाम स्वरूप देव, मनुष्य, पशु आदि मिथ्या भेद प्रतीत होता है। "उस नित्य सिद्ध महत् का निश्वास यह ऋग्वेद है" इत्यादि से भी प्रकृति का अधिष्ठाता पुरुष ही जगत का निमित्त है ऐसा सिद्ध होता है। इस प्रकार इस वाक्य के पुरुष परक निश्चित हो जाने पर, समस्त वेदांत वाक्यों का एकमात्र अर्थ यही होता है कि-सांख्योक्त पुरुष और उससे अधिष्ठिता प्रकृति ही जगत के उपादान कारण हैं, ईश्वर नहीं। सिद्धान्त--एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे, वाक्यान्वयात्-इति । सर्वेश्वर एवास्मिन्वाक्ये प्रतीयते, कुतः ? एवमेवहि वाक्यावयवानामन्योन्या- न्वयः समंजसो भवति । "अमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेन" इति याज्ञवल्क्येनाभिहिते 'येनाहं नामृता स्यां किम‌हं तेन कुर्यां' यदेव भग- वान् वेद तदेव मे ब्रूहि" इत्यमृतत्वानुपायतया वित्ताद्यनादरेणामृत- त्वप्राप्त्युपायमेव प्रार्थयमानायै मैत्रेय्यै तदुपायतया द्रष्टव्यत्वेनोपदि- ष्टोऽयमात्मा परमात्मैव "तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति" "तमेवं विद्वान- मृत इह भवति नान्यः पन्थाः" इत्यादिभिरमृतत्वस्य परमपुरुषवेद- नैकोपायतया प्रतिपादनात् । परमपुरुषविभूतिभूतस्य प्राप्तुरात्मनः स्वरूपयाथात्म्यमपवर्गसाधनपरमपुरुषवेदनोपयोगितयाऽवगन्तव्यम् , न स्वत एवोपायतवेन । अतोऽत्र परमात्मैवामृतत्व उपायतया "द्रष्टव्यः" इत्यादिनापदिश्यते । उक्त संशय पर सिद्धान्तरूप से "वाक्यान्वयात्" सूत्र प्रस्तुत है। उक्त वाक्य में सर्वेश्वर को ही प्राप्तव्य कहा गया है। ऐसा मानने से ही वाक्यों के अर्थ की परस्पर सामंजस्यपूर्ण संगति हो सकती है। "धन से अमरता प्राप्ति की आशा नहीं है" ऐसा याज्ञवल्क्य के कहने पर "जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् ! जो आप अमरता की साधना जानते हों उसे मुझे बतलावें" इत्यादि में मुक्तिलाभ के अनुपयोगी धन संपत्ति का अनादर करते हुए, मुक्ति के उपाय की जिज्ञासु मैत्रेयी को, द्रष्टव्य रूप से जिस आत्मा का उपदेश प्राप्त हुआ, ankurnagpal108@gmail.com