श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६१० ) जीवात्मन उत्पत्तिप्रलयवादोपपत्तिरुत्तरत्र प्रपंचयिष्यते । श्रुतः “एषसंप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परंज्योतिरूपसंपद्य स्वेनरूपेणा- भिनिष्पद्यते” यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे अस्तं गच्छंति नामरूपे विहाय, तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति- दिव्यम्” इत्युत्क्रमिष्यतः परमात्मभावात् जीवशब्देन परमात्म- नोऽभिधानम् इति औडुलोमिराचार्यों मन्यतेऽस्म । जीव ब्रह्म का कार्य है, इससे जीव और ब्रह्म एक हैं, एक के ज्ञान से संपूर्ण का ज्ञान होता है, इस प्रतिज्ञा के प्रतिपादन के लिए ही, ब्रह्म का जीव शब्द से वर्णन किया गया है, यह कथन असंग । है। “ज्ञानी न उत्पन्न होता है न मरता है” इत्यादि में जीव को अजन्मा बतलाया गया है। जीवों के प्राक्तन कर्मों के अनुसार ही जगत् की सृष्टि का भी वर्णन मिलता है, यदि ऐसा न होना तो, सृष्टि में विषमता न होती । ब्रह्म के कार्य आकाश आदि की तरह ब्रह्म के कार्य जीवात्मा का भी यदि ब्रह्म- तापत्तिलक्षण वाला मोक्ष अनायास ही हो जाय तो, मोक्ष प्राप्ति के उपाय अनुष्ठान आदि सब व्यर्थ हो जावेंगे [अर्थात् जैसे आकाश स्वतः प्रकट होकर प्रलय में स्वतः लीन हो जाता है वैसे ही यदि जीवों की भी उत्पत्ति और प्रलय होवे तो अनुष्ठानों की क्या आवश्यकता है] घट आदि की तरह स्वतः ही विनष्ट होने पर अपने कारणत्व को यदि जीव भी पा जावे तो, मोक्षनामक पुरुषार्थ को मानने की आवश्यकता ही क्या है ? जीवात्मा के संबंध में जो उत्पत्ति और प्रलय की प्रसिद्धि है उसका विवेचन आगे करेंगे । “यह जीव इस शरीर से बाहर निकल कर परमात्मा की परंज्योति को प्राप्त कर अपने वास्तविक रूप को प्राप्त कर लेता है, ‘जैसे कि बहती हुई नदियाँ अपने नामरूप को छोड़कर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही विद्वान् पुरुष नाम रूप से मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुष को प्राप्त हो जाता है ।” ऐसे, उत्क्रमणकारी जीव के परमात्मभाव के निरू- पण से ज्ञात होता है कि उक्त प्रसंग में जीव शब्द से परमात्मा का ही वर्णन किया गया है । ऐसा औडुलोमि आचार्य का मत है । ankurnagpal108@gmail.com