श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६०६ ) "यथा सुदीप्तात्पावकाद् विस्फुलिंगाः सहस्रशः प्रभवंते सरूपाः, तथाऽक्षरात् विविधाः सोम्य भावाः प्रजायंते तत्र चैवापियंति ।" इत्यादिभिर्ब्रह्मणो जीवानामुत्पत्ति श्रवणात् तस्मिन्नेव लय श्रवणा- च्च जीवानां ब्रह्मकार्यत्वेन ब्रह्मणैक्यमवगम्यते । अतो जीव शब्देन परमात्माभिधानमिति । एक के ज्ञान से संपूर्ण का ज्ञान हो जाता है इस प्रतिज्ञा की सिद्धि के लिए ही उक्त प्रसंग में केवल आत्मा शब्द का प्रयोग किया गया है जिससे कि जीवात्मवाची शब्दों से परमात्मा का अर्थबोध होता है; ऐसा आश्मरथ्य आचार्य की मान्यता है । यदि यह जीवात्मा, परमात्मा का कार्य होने से, परमात्मा ही न होता, उससे एकदम भिन्न होता तो, परमात्मा को जान लेने पर, इसका ज्ञान नहीं हो सकता था । "सृष्टि के पूर्व यह जगत, एकमात्र आत्मस्वरूप ही था" ऐसे सृष्टिपूर्व के अद्वैत प्रतिपादक वाक्य से उक्त बात की ही पुष्टि होती है । "जैसे प्रज्वलित अग्नि ज्वाला से हजारों चिनगारियां बाहर छिटकती हैं, हे सौम्य ! उसी प्रकार विविध प्रजा भी उस परब्रह्म से उत्पन्न होती है और उसी में विलीन हो जाती है।" इत्यादि वाक्य में कही गई, ब्रह्म से जीव की उत्पत्ति और प्रलय से जीवों की ब्रह्म कार्यता, और ब्रह्मात्मकता ज्ञात होती है। इसलिए जीव शब्द से परमात्मा का ही वर्णन किया गया है, यह निश्चित मत है । उत्क्रमिष्यत एवम्भावादित्यौडुलोमिः ।१।४।२१॥ यदुक्तं जीवस्य ब्रह्मकार्यतया ब्रह्मणैक्येनैकविज्ञानेन सर्वं वि- ज्ञानप्रतिज्ञोपादनाथं ब्रह्मणो जीवशब्देन प्रतिपादनमिति, तदयुक्तम् “न जायते म्रियते वा विपश्चिद्” इत्यादिनाऽजत्वश्रुतेः जीवात्मनां प्राचीनकर्मफल भोगाय जगत्सृष्ट्यभ्युपगमाच्च, अन्यथाविषमसृष्ट्- यनुपपत्तेश्च ब्रह्मकार्यस्यजीवस्य ब्रह्मतापत्तिलक्षणो मोक्ष आकाशादिवदवर्जनीय इति, तदुपायविधानानुष्ठानानर्थक्याच्च, घटादिवत् कारणप्राप्तेर्विनाशरूपत्वेन मोक्षस्यापुरुषार्थत्वाच्च । ankurnagpal108@gmail.com