भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ६० म ) यत्वेन उपादीयन्ते, तस्माद् य एवात्मनो निरुपाधिकनिर्दोषनिरव- धिकः प्रियः परमात्मा, स एव हि दृष्टव्यः, नदुःखमिश्राल्पसुखदुःखो- दर्काः परायत तत्तत्स्वभावाः पतिजायापुत्रवित्तादयोविषयाः, इति । अस्मिंस्तु प्रकरणे, जीवात्मवाचिशब्देनापि परमात्मन एवाभि- धानात् “आत्मनस्तु कामाय” आत्मा वा अरे दृष्टव्यः “इति पूर्वोक्त . प्रक्रिययोभयत्रात्मशब्दावेकविषयौ । उक्त कथन का सारांश यह है कि—पति आदि की प्रीति के लिए, पति आदि प्रिय पदार्थों को, प्रियरूप मैं ग्रहण नहीं किया जाता अपितु अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए, उन सबको प्रिय रूप से ग्रहण किया जाता है, यदि तुम स्वाभाविक निर्दोष अपार प्रिय स्वरूप परमात्मा को, पति, स्त्री, पुत्रादि सभी में देखोगे तो तुम्हारी वास्तविक अभीष्ट सिद्धि होगी, क्योंकि—ये सांसारिक जीव दुःखमिश्रित अल्प सुखदायी, परिणाम में दुखप्रद एवं स्वरूप और स्वभाव से परतंत्र हैं इनको देखने से शांति मिलने के बजाय दुःख ही पल्ले पड़ेगा। इसलिए परमात्मा ही दृष्टव्य हैं, पति पुत्र आदि नहीं। इस प्रकरण में तो, जीवात्मवाची शब्द